मुख मोड़ कर खड़ी है,
समझाऊं कैसे?
दिल तोड़ कर खड़ी हैं,
मनाऊं कैसे?
कमर पे चोटी लटके,
वीणा में तार जैसे।
बीच में लक्ष्मण रेखा पड़ी है,
पास जाऊं कैसे।
धुरंधर सिंह
These lines were written by my father Dhurandhar Singh.
मुख मोड़ कर खड़ी है,
समझाऊं कैसे?
दिल तोड़ कर खड़ी हैं,
मनाऊं कैसे?
कमर पे चोटी लटके,
वीणा में तार जैसे।
बीच में लक्ष्मण रेखा पड़ी है,
पास जाऊं कैसे।
धुरंधर सिंह
These lines were written by my father Dhurandhar Singh.
इश्क़ में मुझसे गुनाह हो गया,
माँ को छोड़कर मैं बीबी का हो गया.
और जब बीबी भाग गयी,
चार बच्चों को छोड़कर,
माँ ने सब भुलाकर, बच्चों और मुझे,
अपने आँचल में छुपा लिया।
परमीत सिंह धुरंधर
इश्क़ ने मेरे समुन्दर सूखा दिया,
हुस्न ने उसके बादलों को पिघला दिया।
मैंने सारी दौलत लुटा दी उसके मुस्कराहट पे,
और अंत में उसने उसी दौलत के लिए,
मेरा प्रेम ठुकरा दिया।
परमीत सिंह धुरंधर
मेरा प्रेम घुट कर रह गया,
बस बन कर मेरी कलम की लिखावट।
कोई मिला ही नहीं, की जीवन निसार कर दूँ,
देख – देख कर उसकी मुस्कराहट।
बस ख़्वाबों तक ही सिमित रहा,
मेरा और उसका चुम्बन।
कानों की किस्मत में कहाँ?
की सुने उनके कदमो की आहट.
जाने रब ने क्यों ना लिखा?
बना के मुझे किसी लड़की की चाहत।
परमीत सिंह धुरंधर
जब से चढ़ी है जवानी तुमपे,
शहर – शहर तेरा दीवाना है.
झूम रहें हैं पंडित और काजी,
तेरे नजरों का पैमाना है.
सुबहा की धुप सी,
तुम जो निकलती हो छत पे.
क्या बच्चे और क्या बूढ़े?
सबका बस तू ही एक निशाना है.
भौरों ने भी छोड़ दिया है,
कलियों को पीना।
जब से तेरे ओठों को छूकर,
पवन हो गया रसीला है.
दुप्पट्टा रखो या,
मुख को छुपा लो घूँघट में.
कसम खा के बैठें हैं,
उठा के तुझे ले जाएंगे।
इस जीवन का अब बस,
तेरी बाहें ही ठिकाना है.
परमीत सिंह धुरंधर
सफर कैसा भी हो, इश्क़ कीजिये।
जिंदगी कैसी भी हो, गुरुर कीजिये।
खुदा से कुछ मिले या ना मिले,
पर खुदा के दर पे, सजदा जरूर कीजिये।
गुनाहों का समुन्दर बहुत ही गहरा है.
इसमें उतरने से पहले, निकलने का हुनर कीजिये।
हुस्न के विषय में क्या लिखूं दोस्तों?
इनकी बाहों में उतर कर खुद को ना मगरूर कीजिये।
परमीत सिंह धुरंधर
परमीत सिंह धुरंधर
मौसम के बदलने का इंतज़ार कर रहे हो,
तुम हुस्न वालों से वफ़ा की मांग कर रहे हो.
जो घर में आते ही माँ को अलग कर दे,
तुम उस औरत से घर का श्रृंगार कर रहे हो.
परमीत सिंह धुरंधर
शहर का शहर है जल रहा,
हुस्न उसका, प्रबल इतना।
क्या वसुधा?
उसकी जुल्फों के लपटों से,
अम्बर तक झुलस रहा.
तारे -सितारे सब टूट रहे,
चाँद भी उनका हो गया है दुर्बल सा.
कोने -कोने में नभ के अमावस्या फ़ैल रहा,
रूप उसका, प्रखर इतना।
परमीत सिंह धुरंधर
समीकरण बदल रहें है भूमण्डल के,
पुष्पित – पुलकित उसके यौवन से.
दो नयन, इतने उसके निपुण,
कण – कण में रण के,
क्षण – क्षण में, हर इक पल में.
पूरब – पश्चिम, उत्तर – दक्षिण में,
तैर रहे हैं तीर, उसके तरकश के.
कट रहे, मिट रहे,
कोई अर्जुन नहीं, अब कोई कर्ण नहीं।
सब जयदर्थ सा छिप रहे,
भय लिए मन में.
अधरों पे मुस्कान लिए,
वक्षों पे गुमान लिए.
वेणी उसके नितम्बों पे,
सम्मोहन का मोहनी बाण लिए.
आतुर हो, व्याकुल हो,
सब चरण में उसके,
सब शरण में उसके,
गिड़ रहे, पड़ रहे.
आखों की आतुरता, मन की व्याकुलता,
देख पौरष की ऐसी विवशता।
देव – दानव – मानव, पशु – पक्षी,
स्वयं ब्रह्मलोक में ब्रह्मा भी,
रच रहे हैं श्लोक उसके रूप के गुणगान में.
परमीत सिंह धुरंधर
अरमाँ दिल के तुम चुराने लगे हो,
निगाहों से विजली गिराने लगे हो.
कभी तो हटाओ ये चिलमन रुख से,
की परमीत को पागल बनाने लगे हो.
हसरतें जवानी की बढ़ने लगी हैं,
तुम्हारी कमर पे नजर टिकने लगी हैं.
मत रखों किताबों को सीने से दबा के,
ये किताबें दुश्मनी का पाठ पढ़ाने लगे हैं.
ये चलना तुम्हारा, ये मुस्कराना तुम्हारा,
इसके सिवा कुछ भाता नहीं है.
हौले – हौले से रखों क़दमों को जरा,
ये वक्षों का स्पंदन मुझे बहकाने लगे हैं.
इन निगाहों से, इन लबों से,
ना रखों प्यासा हमें।
तेरी चोली के बटन पे हम,
मरने लगे हैं
परमीत सिंह धुरंधर