इंसान बनने का मजा ही कुछ और है


शौक मुझे भी है की खुदा बनू,
मगर इंसान बनने का मजा ही कुछ और है.
ताकत के बल पे,
तो शैतान भी दुनिया को अपना बना ले.
मगर संघर्ष और बुलंद इरादों का नशा,
ही कुछ और है.
मैं मौन हूँ,
ये मेरी कमजोरी नहीं।
सपनों को सीने में दबाने का,
मजा ही कुछ और है.
ये निश्चित है की एक दिन,
तुम्हे कसूँगा अपनी इन बाहों में.
मगर जवानी में तनहा विरह की आग में,
जलने का नशा ही कुछ और है।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न


टूट कर भी समंदर,
बिखरता नहीं।
ये दरिया है,
जिसकी किस्मत में ठहरना नहीं।
इश्क़ हमने भी किया है,
हुस्न के मिजाज में कहीं कोई वफ़ा नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

वो ख्वाब भी तो न रहा


जो मुझे यकीन दिला दे,
वफाये – मोहब्बत का,
ऐसा तो कोई हुस्न नहीं।
और उनके अंगों से मोहब्बत हो जाए,
मेरा अब वो दौर भी तो नहीं रहा.
जो भी मिलती हैं,
मिलती है बस अपनी चोली को कसकर।
उन्हें क्या पता?
की इन आँखों में वो ख्वाब भी तो न रहा.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न


वफाये – मोहब्बत, हुस्न के आँचल में तो ना देख,
इनके अंगों पे ठहरता इनका आँचल भी तो नहीं।
दरिया की मिठास वही मुसाफिर याद रखते हैं,
जिनका घर कभी किनारों पे बसा ही नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

संसार


तुम मिले तो ख्वाब बने,
बन गया पूरा संसार।
और कोसिस की जो तुम्हे पाने की,
तो एक -एक कर, टूटा हर ख्वाब।
तुमने छल लिया नैनों से,
जाम छलका- छलका के.
तुम मिले तो प्यास जगी,
जग गयी पूरी हर रात.
और कोसिस की तुझे पीने की,
तो एक -एक कर, टूटा हर जाम.
तू बलखाई, तू अंगराई,
तू शरमाई हर रंग में.
और जो कोसिस की तुझे,
थामने की,
तो मिट गया हर प्यार।

 

परमीत सिंह धुरंधर

सिलवट – हल्दी


चलो हम कोई गुनाह कर लें,
तुम चाँद बनों, हम कोई दाग ही बन लें.
अगर ये बंटवारा न हो मंजूर,
मोहब्बत में.
तो हम काली सी कोई घटा बन लें,
तुम चमकती-करकती बिजली ही बन लो.
तुम कहो तो बरस जाएँ,
तुम कहूं तो बिखर जाएँ।
तुम यूँ ही आगोस में रहो,
ग़मों के हर तूफ़ान को सह जाएँ।
चलो हम भी एक हो जाएँ,
तुम दिया बन लो,
हम बाटी बन लें.
अगर ये बंटवारा भी न मंजूर हो,
मोहब्बत का.
तो तुम सिलवट बन लो,
हम हल्दी बन लें.
चलो हम कोई गुनाह कर लें,
तुम चाँद बनों, हम कोई दाग ही बन लें.
अगर ये बंटवारा न हो मंजूर,
मोहब्बत में.
तो हम काली सी कोई घटा बन लें,
तुम चमकती-करकती बिजली ही बन लो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

वो अपने वक्षो पे चोली कस रही हैं


नादाने – दिल को संभालो यारों,
की दरियाँ में आग लग रही है.
प्यास है की मेरी मिटती नहीं,
और वो अपने वक्षो पे चोली कस रही हैं.
बस दो घड़ी का ही है प्यार उनका,
जिसकी कसमे को वरसों से खाती थी.
की अभी जी भर के चूमा भी नहीं,
और वो अपनी अंगिया पहन रही हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ये जवानी तेरे वक्षों पे गुजरे


जिंदगी का हर बंधन, तन्हाई में गुजरे,
मगर ये जावानी तेरे संग एक चटाई पे गुजरे।
तू सरक न सके, मैं सरकने ना दूँ,
तू पलट न सके, मैं पलटने ना दूँ.
इसी जद्दोजहद में, पूरी रात यूँ ही लड़ाई में गुजरे।
मगर ये जावानी तेरे संग एक चटाई पे गुजरे।
तू सोचे की तेरे माँ – बाप ने कहाँ बाँध दिया,
मैं सोचूं की कमबख्त ये कहाँ फंस गया.
इसी पेशोपश में उम्र का हर लम्हा गुजरे।
मगर ये जवानी तेरे वक्षों पे गुजरे।
जिंदगी का हर बंधन, तन्हाई में गुजरे,
मगर ये जावानी तेरे संग एक चटाई पे गुजरे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

कोयल से बोला काग रे


मधुर – मिलान की आस में,
कोयल से बोला काग रे.
कभी तो आके बैठ ज़रा,
मेरी इस डाल पे.
तू भी तो देख जरा आके,
कितना यहाँ सूनापन,
और कितनी मुझमे तेरी प्यास रे.
मधुर – मिलान की आस में,
कोयल से बोला काग रे.
तू भी काली, मैं भी काला,
फिर भी दुनिया तुझको पूजती।
छल लेती है हर बार तू मुझे,
फिर भी जग को सच्ची तू ही दिखती।
कभी तो समझ इस दिल को तू,
ये कितना अकेला और बेताब रे.
मधुर – मिलान की आस में,
कोयल से बोला काग रे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बहती रहूँ यूँ ही


दरिया – दरिया इश्क़ करूँ मैं,
सागर-सागर प्रीत रे.
तू जो रहे हर किनारे पे मेरे,
बहती रहूँ यूँ ही, मैं, सदा – नित रे.
मेरी लहरें, मेरी हो कर भी,
रहती हैं सदा तेरी चाह में.
जल सी ठंठी हो कर भी मैं,
सुलगती रहती हूँ तेरी आस में.
तू जो मेरी लहरों पे ही हर कंकड़ मारे,
बहती रहूँ यूँ ही, मैं, सदा – नित रे.
दरिया – दरिया इश्क़ करूँ मैं,
सागर-सागर प्रीत रे.
तू जो रहे हर किनारे पे मेरे,
बहती रहूँ यूँ ही, मैं, सदा – नित रे.

 

परमीत सिंह धुरंधर