आँखों से पिला दूंगी,
पल- दो- पल तो जरा बैठों।
आँचल ही तो है सीने पे,
इसे तुम पर्दा तो न समझो।
हर दूरी मिटा दूंगी,
पल- दो- पल तो जरा बैठों।
काजल ही तो है आँखों में,
इस तुम इंकार तो न समझों।
सब कुछ मिटा दूंगी,
पल- दो- पल तो जरा बैठों।
बाबुल ही तो हैं आँगन में,
इस शैयार तो न समझों।
सीने से लगा लुंगी, परमीत
पल- दो- पल तो जरा बैठों।
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सांवरे
मैं रात भर सोती नहीं,
जब तुम आ जाते हो सांवरे।
जब सीमा पे रहते हो, तुम
तो आँखों में यूँ ही नींद नहीं।
अब क्या देखूं मैं आईना,
जब तुम बैठे हो पास सांवरे।
जब सीमा पे रहते हो, तुम
तो मैं कभी सजती ही नहीं, परमीत।
हाले – दिल
जिंदगी जितनी भी दर्दनाक हो,
जवानी मुरझाने नहीं देती.
खुशिया बरसो बाद मिले,
तो वो बांटी नहीं जाती.
बहुत इंतज़ार के बाद जब,
कोई मिल जाए अपना.
तो हाले – दिल परमीत,
आोठों से बयां नहीं होती.
जिद
कुछ उनकी भी जिद थी,
कुछ मेरी भी गुस्ताखी,
ना वो पीछे मुड़ी,
ना हमने ही नजरे,
कही और डाली, परमीत
वो जिनकी याद में दिल ने आघात कर दिया….
मयखानों से दूर,
हुस्न और खंजर
आज आँखों से पिलाया है,
कल ओठों से पिलायेंगी,
उस दिन समझोगे मोहब्बत को,
जब सीने में खंजर को उतरेंगी।
न छलक ही पायेगा आँखों से पानी,
न ओठों से ही कुछ कह पावोगे,
आज बाहों में सुलाया है,
कल राहों में दुत्कारेंगी,
उस दिन समझोगे मोहब्बत को,
जब बाजार में लायेंगी।
जिसके मुस्कान पे छोड़ा है घर और द्वार,
वो ही मुस्करा कर दर-दर पे नचाएंगी,
आज गोद में बिठाया है,
कल पावों कि ठोकर लगायेंगी।
उस दिन समझोगे परमीत मोहब्बत को,
जब हुस्न का असली रंग वो दिखाएंगी।
माँ
एक बेवफा ने लुटा,
मोहब्बत में हमको पिला के,
हर मोड़ पे गिर रहा हूँ,
जवानी में ही मैं लड़खड़ा के.
एक -एक चोट पे मेरे छलकता है,
दर्द पिता कि आँखों में,
और मुस्कुराता है यार मेरा,
मेरे जख्मो पे एक नयी अदा से.
एक बेवफा ने हाँ लुटा,
आँचल में अपने सुला के,
भटकने लगा हूँ अब,
अपनी ही गलियों में आके.
जिसके लिए परमीत ने छोड़ा,
अपनी माँ को रोते हुए,
आज माँ ही बैठी है उसके,
जख्मों को अपने सीने पे लेके.
नैतिकता-अनैतिकता
कि हम पागल हो गये जिनकी आँखों में झाँक के,
जाने कैसे लूट गये लोग, उनको बाहों में भर के.
कि आज तक नहीं भुला परमीत, जिस दरिया में डूब के,
जाने कैसे पार हो गये लोग, उन धरावों में तैर के.
कि मिटने लगे हैं हम जिस नैतिकता का पाठ पढ़ कर,
जाने कैसे जी रहें हैं लोग, अनैतिकता से बांध के.
रसिया
आज हमने जमाने को रसिया, आँचल के तले अपने सो लेने दिया,
चैन मिला उनको,
चैन मिला उनको, लूटने पे मेरे,
तो दिल खोल के फिर,
तो दिल खोल के फिर, हमने खुद को लूटने दिया।
आज हमने जमाने को रसिया, योवन के रस से सींच दिया,
फूल खिले उनके,
फूल खिले उनके, उजडने पे मेरे,
तो दिल खोल के फिर,
तो दिल खोल के फिर, हमने खुद को उजडने दिया।
आज हमने जमाने को रसिया, आँखों में अपने काजल बन्ने दिया,
सपने सजे उनके,
सपने सजे उनके, टूटने पे मेरे,
तो दिल खोल के फिर,
तो दिल खोल के फिर, हमने खुद को टूटने दिया।
आज हमने जमाने को रसिया, पावों में अपने मेहँदी लगाने दिया,
आँगन चमका उनका,
आँगन चमका उनका, बिखरने पे मेरे,
तो दिल खोल के फिर,
तो दिल खोल के फिर, हमने खुद को परमीत बिखरने दिया।

