जब ठोकरों में तौलती है जिन्दगी,
तो माशूका की जुल्फें भारी होती हैं,
जब रातों के उड़ने लगती हैं नींदें,
तो मेरी माँ, तेरी लोरी याद आती है.
अर्जुन की मोहब्बत को भुला कर,
जब वो दुर्योधन की जाँघों पे बैठतीं हैं,
मेरे भाई, तेरा प्यार आँखों में उतर आता है.
पराजय जब चूमती है मस्तक को रण में,
तो माशूका की बांहें अरुवों की शिविर बनती है.
जख्मों में जब उबलती है रक्त की बुँदे,
तो पिता तेरी गोद, परमित को बहुत याद आती है…..Crassa
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रौनके-आस्मां
टूटे हुए तारे से न पूछ रौनके-आस्मां,
उसके दामन में इतने सितारें,
एक मैं टूट भी गया तो उसका क्या.
मुरझाये कलि से न पूछ दास्ताने-गुलिस्ताँ,
उसके पहलु में इतने फूल,
एक मै मुरझा भी गया तो उसका क्या.
आशिक की मौत पे ना पूछ हाले-जिगर महबूबा का,
उसके आँचल में इतने हैं बैठे ,
एक मै मिट गया भी तो उसका क्या.
पूछना ही है अगर तुझे परमित, तो
उस माँ के दिल से पूछ, जिसके बेटे को आशिक बना के ,
अंगराई
उनकी हर अदा मस्तानी है दोस्तों,
कुछ उम्र का तकाजा है,
कुछ उनकी बेवफाई दोस्तों.
निकलतीं हैं जब भी गलियों में,
हाहाकार मच जाता है,
कुछ तो उनकी अंगों का तकाजा है, परमित
कुछ उनकी अंगराई दोस्तों…..Crassa
हुस्न
हुस्न वो चीज हैं परमित,
जिसने कई घर लूटे हैं,
सिर्फ एक घर बसाने के लिए…..Crassa
दिले-कब्र
उनसे दिल लगा के हम एसे खो गयें परमित,
की घर का पता भी तब चला जब कब्र में आ गयें .
किस्मते-बेवफाई
रात गुजरने वाली हैं,
जाम मेरा अब भी खाली हैं.
इतना बता तू ए साकी,
ये मेरी किस्मत या तेरी बेवफाई है.
एसा भी मुझमे हैं क्या,
जो भेद तू जान गयी.
सबके पहलु में तेरा दामन,
बस मुझसे ही ये तेरी दुरी हैं.
झूम रहें हैं जो तेरी मस्त आदवों पें,
दो पल के मेहमान हैं तेरी अंगराई के.
सारी उम्र तेरे दर पें मैंने गुजार दी ,
फिर भी मेरी सिर्फ तन्हाई हैं.
इतना बता तू ए साकी,
ये परमित की किस्मत या तेरी बेवफाई है….Crassa
चाहत
तेरा चेहरा आज भी हजारो में हैं ,
इस ढलती उम्र में भी वो मेरा दर्द हैं.
एक झलक से तेरे सुकून मिल रहा ,
नाउमिदों को उमिंद मिल रहा.
ना छुपा इस हुस्न को,
चिलमन में मेरे महबूब.
आज भी परमित का दिल,
तेरी पनाह मांग रहा…..Crassa
जलती हूँ मैं…..
हर रात जलती हूँ मैं,
जिसकी आगोश में,
उसी को नहीं पता कि,
कितना जली हूँ मैं इस प्यास में.
बुझ जाती है हर रात जवान हो के,
एक ही सांस में,
रह जाती हूँ मैं बस,
अकेली तन्हा बंधी इस प्यास में.
बरसती हूँ बनके,
काली घटा हर रोज,
मेरी बूंदों को मगर,
बस मिली है ये बंजर जमीन.
बरसों से सजती आ रही हूँ,
जिस आईने के सामने,
वो भी कहने लगा है कि,
मुझमे ही कोई हैं कमीं.
इठलाती-बलखाती,
नदियाँ थी कभी मैं,
आज बस मंथर,स्थूल,
एक प्रवाह रह गई हूँ मै, परमित……Crassa
Crassa का इम्तहाने-इश्क
उनकी आधी तस्वीर ही देख कर,
दिल ने उनको अपना कह दिया,
कितनी धड़कने उठी ह्रदय में,
आँखों ने सुनहरा सपना देख लिया.
वो खुबसूरत हैं या नहीं,
अब ये कोई मायने नहीं रखता,
मैंने तो उन्हें , कब का
अपनी जिन्दगी मान लिया.
वो मिली, मगर मैं कह,
भी न सका हाले-दिल,
अपनी खामोश मोहब्बत को,
परमित ने इम्तहाने-इश्क समझ लिया…….Crassa
कक्षा बारह की मोहब्बत
लिखती थीं जो अपनी आँखों से,
मधुर निवेदन,
कि जहाँ कोई न खड़ा हो, वहाँ
मिलने का निमंत्रण.
चलती थीं सखियों संग,
बोझिल कदमो को आगे बढ़ाते,
मगर नज़रें खोजती थीं,
मुझे उनके पीछे आते.
किताबों में छुपा कर,
जो करती थीं,
दिलों का आदान – प्रदान,
आखरी रोटी को बचाकर,
खिलाती थीं जो,
लगाकर शहद सी मुस्कान.
जवानी की दहलीज पर,
वो गंगा की पहली मौज थीं,
मेरी कक्षा बारह की,
न्यूटन के तीसरे नियम की खोज थीं, परमित…..Crassa