दिल लेके बैठा हूँ, 34 पे आकर भी,
वो 26 पे कहती हैं, “आप बड़े कातिल हो जी.”
6- घंटे तक चली, सरहद पे लड़ाई,
तब जा के सवान बरसा, वो मेरे छतरी में आईं, परमित.
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तुम हो दिल में,
तुम इस कदर उतर गये हो दिल में,
अब क्या रखा है खोंने में.
तुम अगर मिल जावो हमें,
क्या रखा है फिर ज़माने में.
हर साँस की मेरी तुम ही चाहत,
हर रात की मेरी तुम ही हो आहट,
तुम खनका दो जो अपने पायल,
तो क्या रखा है मदिरालय में.
नयनों से अपने सींचती हो मेरे जख्मों को,
अब पास आ कर कह दो की मेरे जख्म हैं तुम्हारे,
तुम लहरा दो अप्पना आँचल,
तो, परमित, फिर सावन में क्या रखा है
एक इल्तिज्ज़ा
एक इल्तिज्ज़ा है दिल की,
मेरे पास आइये,
कुछ दुरी भी रहे ,
कुछ शर्म भी रहे,
मैं अपनी साँसों को न रोक सकूँ,
आप अपनी बोझल पलकों से न कह सकें।
एक इल्तिज्ज़ा है दिल की,
की अपन जुल्फों में बांध लीजिये,
मैं बादल बनके न अम्बर पे उड़ सकूँ,
आप तितली बनके न खो सकेन.
एक इल्तिज्ज़ा है दिल की,
दो बूंद अपने प्याले से छलका दीजिये,
मैं अपनी प्यास न मिटा सकूं, परमित
आप न फिर मुझे पिला सकें।
काली लटें
काली लटों से ना यूँ खेला करों,
पास आये हो तो थोड़ा कह भी जाया करो.
मिलते हैं रोजाना इनसे खेलने वाले,
पहलु में आये हो तो सो भी जाया करो.
काली लटों से ना यूँ खेला करों,
पास आये हो तो थोड़ा कह भी जाया करो.
बसे हैं कितने यहाँ मुझे छूने वाले,
तुम तो दिल को मेरे बसा जाया करो.
जिस्म मेरा गोरा पर दिल अंधेरो में है,
चहकते हो इतना कभी धडकनों को मेरे चहकाया करो.
मेरा क्या है परमित, एक दिन तुझे मिटा दूंगी,
उसके पहले ही ईद-दीपावली मनाया करो.
योवन के झूले
कहाँ से चली हो,
कहाँ तक चलोगी,
जरा बतला दो न.
खुली-खुली लट है,
चंचल चितवन है,
आँचल के बोझ को,
इसपे से अब हटा दो ना.
खिला खिला अंग है,
उभरता बदन है,
अपने योवन के झूले में,
मुझको भी झुला दो ना.
कतराना III
मुझे दर्द का,
पता भी नहीं,
और आँखे मेरी,
छलकने लगी.
बड़ी बेवफा,
मेरी महबूबा,
मइयत पे ही मेरी,
वो निगाहें लड़ाने लगी.
शिकवा करें,
तो किस से करें,
जिसे अपना कहा था,
वो गैरों की बाहों में,
अब सिमटने लगी, परमित.
कतराना II
न गम कर,
मेरी बेवफाई का.
न शौक कर,
मेरी अंगराई का.
मैं कल भी,
सिक्कों की खनक,
पे सजती थी.
मैं आज भी,
सिक्को पे ही,
तौलती हूँ.
न बेकरार कर,
मुझसे दूर जाकर,
न एतबार कर,
बाहों में आकर.
मैं कल भी,
मोहब्बत में छलती थी,
मैं आज भी,
प्यार में ठगती हूँ, परमित.
कतराना
तेरी जुल्फें कभी मेरे चेहरे पे भी छाती थीं,
तेरी जुल्फें आज भी लहराती हैं.
बस फर्क इतना ही है हुस्न,
की तू कल तक जिसकी बाहों में थी,
आज उसी से कतराती है.
तू कल भी लाल रंग से सजती थी,
तुझे आज भी लाल रंग में भाती है.
बस फर्क इतना ही है हुस्न,
की तू कल तक जिसकी साडी पहनती थी,
आज उसी से कतराती है, परमित
हल्दी
ना निखारा करो तन को अपने,
यूँ तुम हल्दी लगा के.
की बचपन से ही पीता हूँ, मैं
दूध में हल्दी मिला के.
यूँ ही नहीं है मेरा नाम Crassa,
Cross लगाएँ है मैंने हाजारों ,
बस हल्दी छुआ के, परमित.
गोरी और काली रानी
एक राजा की दो रानी,
एक गोरी ,
एक काली-कानी.
एक दिन शिकार में,
राजा हार गये,
शेर के प्रहार से.
कैसे तो जान बची,
पर बिछुड़ गये राजा,
आपने रानी के श्रींगार से.
घोड़े दोड़े ,
मंत्री भागे,
पूरब से पंछिम तक,
कोना-कोना छान मारा,
उत्तर से दक्खिन तक.
राज-पाट सँभालने को,
मंत्री बन गये राजा,
और, रानियाँ भूल गयी,
राजा को मंत्री के प्यार से.
भूलते-भटकते, एक दिन राजा
जा पहुंचे अपने दरबार में,
दुर्बल-मलिन तन को,
पहचान न सकी गोरी रानी,
कानी रानी ने स्वागत किया, परमित
राजा का प्रेम के मल्हार से.