नशा पीने से हो या पिलाने से हो
नशा होना चाहिए।
दर्द सीने में हो या जीने में हो
दर्द होना चाहिए।
इश्क़ कुवारी से हो या विवाहित से हो
इश्क़ होना चाहिए।
परमीत सिंह धुरंधर
नशा पीने से हो या पिलाने से हो
नशा होना चाहिए।
दर्द सीने में हो या जीने में हो
दर्द होना चाहिए।
इश्क़ कुवारी से हो या विवाहित से हो
इश्क़ होना चाहिए।
परमीत सिंह धुरंधर
वो जो मुझे तन्हा कर गयी
अब अपनी तन्हाई का जिक्र करती हैं.
दो पल में ख़त्म हो जाते हैं उनके सारे किस्से
और मेरे संग के दो पल का घंटों जिक्र करती हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
उनसे नजर का जो मिलना हुआ
पतली कमर का सिहरना हुआ.
कैसे सँभालते साँसों को हम?
नस-नस में उनका ऐसे उतरना हुआ.
परमीत सिंह धुरंधर
इश्क़ ने तन्हा कर दिया उम्र की बंदिशे लगाकर
उनकी पावों में पायजेब दे दिया मेरी नींदे उड़ाकर।
परमीत सिंह धुरंधर
सर्वदा – सर्वदा
बहती रहो धरा पे
नर्मदा – नर्मदा।
सम्पूर्ण करती हो भारत को
यूँ ही सम्पन करती रहो भारत को
गंगा – जमुना,
ताप्ती – गोदावरी – नर्मदा।
तुम्हारे ही तट पे रचे गए
वेद-उपनिषद-पुराण
तुम्हारे ही धाराओं से
उत्पन हुए ऋषि – मुनि – विद्वान।
सदियों से कर रही हो
भारत को परिभाषित
यूँ ही बनी रहो भारत की परिभाषा
सर्वदा – सर्वदा, नर्मदा – नर्मदा।
युगो – युगो से
पाल रही, पोस रही
सृष्टि को इस धरती पे
युगो – युगो तक यूँ ही माँ
करती रहो सबपे कृपा
सर्वदा – सर्वदा, नर्मदा – नर्मदा।
परमीत सिंह धुरंधर
ऐसा भी नहीं की मैं सजती रहूं दिन भर
ए आइना अपनी औकात में रह.
ऐसा भी नहीं की मैं सजना छोड़ दूँ
ए आइना अपनी औकात में आ.
अभी तो अंग खिलें हैं मेरे
अभी तो पंख खुलें हैं मेरे
ऐसा भी नहीं की उड़ना छोड़ दूँ
ए हवा अपनी औकात में आ.
ये घोंसले उन खगों के हैं
जिनमे अब उन्माद नहीं।
मेरे नयन, नख से तीखे
तो ए निशा अपनी औकात में आ.
परमीत सिंह धुरंधर
हसरते उन्ही की दिलों में रखिये
जिनकी यादों में हैं पीने लगे.
कब तक संभालोगे जाम हाथों से
आँखों से दर्द जब हैं छलकाने लगे.
अधूरा है जीवन सब का यहाँ
चाहे राम हो या गुरु गोबिंद सिंह जी.
राजपूत वो ही है सच्चा
जो रणभूमि में अपनों पे गांडीव उठाने लगे.
परमीत सिंह धुरंधर
उनके जिस्म पे जो
ये गहने हैं
पैसों से तो सस्ते
पर पसीने से बड़े महंगे हैं.
कैसे उतार के रख दे?
वो ये गहने अपने जिस्म से
चमक में थोड़ी फीकी ही सही
मगर इसी चमक के लिए
मेरे बैल दिन – रात बहते हैं.
मेरे बैलों को कोई पशु ना कहे
हैं की उन्ही के बल पे
मेरे घर के चूल्हे जलते हैं
और उनके कर पे वस्त्र
और गहने चमकते हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
उनके जिस्म पे जो
ये गहने हैं
पैसों से तो सस्ते
पर पसीने से बड़े महंगे हैं.
यूँ ही नहीं
इठलाती हैं, बलखाती हैं
सखियों के बीच वो
और फिर लौटते ही
मेरे जिस्म पे झूल जाती हैं.
उनकी ये अदा दौलत के आगे
तो बहुत फीकी है
पर शोहरत में बहुत चमकीली है.
परमीत सिंह धुरंधर
तानी धीरे – धीरे सैया
खोलीं किवाड़ के.
जागल होईअन सास अभी
दे वे लागियन आवाज रे.
तानी धीरे – धीरे सैया
खोलीं किवाड़ के.
सगरो से दुखाता
सारा ई देहिया।
अब जे उठेंम
त चढ़ जाई बुखार रे.
तानी धीरे – धीरे सैया
खोलीं किवाड़ के.
बाटे रउरा से प्यार बहुत
ना त टिकती ना इ सुखल – ससुरा में.
मुँह बंद करके धीरे – धीरे सैया
चढ़ी खटिया पे.
बाबू जी ढूढ़तारन सुबहे से.
परमीत सिंह धुरंधर