तुमसे इश्क़ हुआ तो ज़माने को समझने लगे.
तुम्हारे पीछे है अब जमाना, मुझे लगाने को ठिकाने।
परमीत सिंह धुरंधर
तुमसे इश्क़ हुआ तो ज़माने को समझने लगे.
तुम्हारे पीछे है अब जमाना, मुझे लगाने को ठिकाने।
परमीत सिंह धुरंधर
प्रेम वही जिसमे मिलान हो,
विछोह तो गाय से बछड़े का होता है.
अभी मुख से स्तन छूट भी नहीं,
और खूंटे से इनको बंधन होता है.
प्रेम, वही, जिसमे ओठों से रसपान हो,
विछोह में तो मीरा को विषपान होता है.
अभी विरह में ह्रदय जी भर के रोया भी नहीं,
और मीरा को जग से जाना पड़ता है.
परमीत सिंह धुरंधर
समुन्द्रों को बचा के रखो अपने,
इश्क़ में सबको रोना होता है.
परमीत सिंह धुरंधर
कलम आपको वो समय देखने को शक्ति देती है, जो आप लाना चाहते हो. लेकिन आप विवस हो और नहीं ला सकते। कलम, आपको अपनी असफलताओं को छुपाने का माध्यम है. दुनिया के सबसे असफल आदमी की कलम ज्यादा मुखर होती है. ये पंक्तियाँ, उन लड़कियों और महिलाओं के लिए समर्पित है जिन्हें ३१ दिसम्बर २०१६ को बंगलोरे में शारीरिक उत्पीरण का सामना करना पड़ा. कुछ लोग बस जीवन में सिर्फ लड़कियों को पाना चाहते हैं. और मैं वो समय लाना चाहता हूँ जब कोई भी लड़की कैसे भी अपनी मर्जी से जीये और जी सके.
काले – काले मन के,
पहले भ्रम को,
कैसे तोड़ दूँ मैं?
मैं नहीं रखूंगी अम्मा,
चुनर अपने बक्षों पे.
गली-गली में गुजरती हूँ जब,
खुल जाते हैं, सब खिड़की-दरवाजे।
मेरी चाल पे बजाते हैं,
सीटी, बच्चों से बूढ़े।
अपनी नयी – नयी जावानी को,
नहीं ढकूँगी अम्मा, रखके,
चुनर अपने बक्षों पे.
परमीत सिंह धुरंधर
समुन्द्रों में अब तो, उठा दो लहरें,
तुम अब जावां हो गयी हो, बिखर दो ये जुल्फें।
तुम्हारा शर्माना माना की बहुत ही जायज है,
पर कभी तो बेशर्म बन कर, उठा दो ये पलकें।
कब तक काजल से ढकोगी खवाबों को सुला के,
कभी तो जिला दो इन्हें गिराके सब दीवारें।
परमीत सिंह धुरंधर
मैं धरती पे नहीं आया हूँ, मिटटी में बस मिल जाने को,
धरती का सीना फाड़ कर, कोई फसल खिला जाऊँगा।
बादल, दरिया, सब भले बैरी बन जाएँ,
तब भी फूल न सही, बबूल ही बसा जाऊँगा।
दर्जनों की भीड़ बैठती है बस शिकायतें करने को,
मैं तन्हा ही सही अपनी राहों में, पर एक भीड़ लगा जाऊँगा।
बहुत दूर तक चला हूँ, तन्हाई को ढ़ोते-ढ़ोते,
जब भी बैठूंगा कहीं, इनको सुलगा जाऊँगा।
परमीत सिंह धुरंधर
तुम्हारा रूप देख, सूरज तपता है,
मगर तुम्हारी जिस्म को बस चाँद छूता हैं.
नहीं चाहिए वो हुस्न मुझे,
जिसकी जवानी उसपे ये दोहरापन लाता है.
परमीत सिंह धुरंधर
हम इकिस्वी शताब्दी में आ गए,
उनको शिक्षा मिली,
उनको अधिकार मिले,
नारी आज चाँद पे पहुँच गयी.
पर हुस्न की नियत पे हम क्या लिखे?
आज भी दस-दस पुत्रियों के,
माता-पिता नहीं चाहते की,
उनका पुत्र,
किसी लड़की के प्रेम में पड़े.
परमीत सिंह धुरंधर
जो इंसान,
परेशान है सारे शहर में.
शायद वो किसी का,
बाप हैं.
शायद उसका पुत्र,
पड़ गया है किसी के इश्क़ में.
और उसके बुढ़ापे का,
वो एक ही चिराग है.
परमीत सिंह धुरंधर
समंदर जब अपने ज्वार-भाटे के उबाल पे था,
तब कसा था मैंने उसे अपने बाहों में.
मेरे मिटने के बाद, उतारी हैं जमाने ने,
कस्तियाँ अपनी उसके लहरों पे.
वो जो बखान करते हैं महफ़िल-महफ़िल
अपनी रातों का.
नहीं जानते की कितने परवाने सोएं हैं,
उनसे पहले, उनकी शर्मीली शमा के आगोस में.
परमीत सिंह धुरंधर