दो पलकों का खेल है सारा,
दो पलकों पे खेल है.
दुनिया साड़ी देख रही है दिलबर,
हम दोनों में जो मेल है.
परमीत सिंह धुरंधर
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दो पलकों का खेल है सारा,
दो पलकों पे खेल है.
दुनिया साड़ी देख रही है दिलबर,
हम दोनों में जो मेल है.
परमीत सिंह धुरंधर
तुझे प्यार करेंगे,
सारी रात करेंगे।
बुलबुल बन जा तू,
गुलशन में राज करेंगे।
तिनका-तिनका जोड़ के,
बनाएंगे फिर एक घोंसला।
तू करना जहाँ मनमानी,
हम तेरे गुलाम बनेंगे।
तुझे प्यार करेंगे,
सारी रात करेंगे।
परमीत सिंह धुरंधर
लहरो को बाँध ले, ऐसा कोई किनारा देखा ही नहीं,
सागर की बात मत कर, उसकी नदियों में वो योवन ही नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
मेरी मोहब्बत को अपना कह दीजिये,
और अपना दर्द हमें दे दीजिये।
कुछ और हम न कभी कहेंगे,
ना आप ही कोई हमसे, और सौदा कीजिये।
परमीत सिंह धुरंधर
दफ़न करूँ कैसे, कहाँ, मोहब्बत,
कभी मैंने ही जर्रे-जर्रे पे उनका नाम लिखा था.
अब कैसे कह दूँ उनको खुदगर्ज, बेवफा,
जिसे मोहब्बत में कभी खुदा कह के मैंने ही पूजा था.
वो मिलती थी सज – सवर के रोज हमसे,
हमने कब सोचा था, वो हम नहीं, कोई दूजा था.
परमीत सिंह धुरंधर
उनकी हर सरहद पे,
मेरी लहरो का निशान आज भी बाकी है.
दुश्मनो में हलचल मचा देने के लिए,
मेरा एक नाम ही काफी है.
मैं हार के बैठ भी जाऊं,
तो गम होता है उन्हें।
उनके माथे पे एक बल के लिए,
बस मेरी चंद साँसे ही काफी हैं.
वो सजती हैं,
घंटो आइना देख के.
उनकी आँखों में हया और गालो पे लाली के लिए,
मेरी एक नजर ही उनपे काफी है.
बरसों से कोशिस कर रहा है जमाना,
मुझे बिखराने के लिए.
उसकी हर आजमाइश पे,
मेरा मुस्कुराना ही काफी है.
परमीत सिंह धुरंधर
मौत पे मेरे इतना कर देना,
उनकी आँखों का काजल थोड़ा हमें लगा देना।
जन्नत नहीं, जहन्नुम में भी सुकून मिलेगा मुझे,
यकीन है हमें,
बस उनके गजरे के दो-चार फूल मेरे जनाजे पे डाल देना।
परमीत सिंह धुरंधर
बहुत जलील हुआ हूँ पर अब भी मज़ा आता है.
हुस्न ही उनका ऐसा है, देखने के बाद नशा आता है.
मत पूछ क्या पाता हूँ बिना बाँहों में गए उनके,
लहरों में उतर के कौन सागर की गहराई नाप के आता है.
परमीत सिंह धुरंधर
अब खुदा भी नहीं पूछता मेरा हाले-करम,
अकेला रह गया हूँ उठा के तेरा जुदाई का गम.
मोहब्बत कभी भी इतनी शिद्दत से मत कर,
की उनका बिछुरना बन जाए जिंदगी का आखरी सितम.
परमीत सिंह धुरंधर
घर बसा लेने को वो कहती हैं मोहब्बत,
और आज भी एक ही घर में रहती है.
सजाती हैं – सवारती हैं दीवारों को दीवाली में,
हम फ़कीर दिया ना जलाये, तो ठोकर खा जाती हैं.
परमीत सिंह धुरंधर