ए कलम,
क्या लिखूं,
उनकी खूबसूरती पे.
जब भी मिलीं,
सारे दिए बुझ गए.
चाँद भी निकलता है,
तो तारो को साथ ले के.
वो तो एक सूरज थीं,
जब भी निकलीं,
सारे सितारे डूब गए.
परमीत सिंह धुरंधर
Every thing is related to love and beauty
ए कलम,
क्या लिखूं,
उनकी खूबसूरती पे.
जब भी मिलीं,
सारे दिए बुझ गए.
चाँद भी निकलता है,
तो तारो को साथ ले के.
वो तो एक सूरज थीं,
जब भी निकलीं,
सारे सितारे डूब गए.
परमीत सिंह धुरंधर
माँ ने पुकार है आज पुत्र कह के तुझे,
और क्या फिर ख़िताब चाहिए।
ये सारी सल्तनत रख ले तू खुदा,
मुझे बस मेरी एक माँ चाहिए।
जिसके चरणों में गंगा – यमुना,
और हाथों में हर एक धाम है.
अपने हाथों से आज खिलाया है तुझे,
और क्या फिर मान चाहिए।
ये सारी सल्तनत रख ले तू खुदा,
मुझे बस मेरी एक माँ चाहिए।
परमीत सिंह धुरंधर
ये मत पूछ की वो कितने रात मेरे पास थीं,
ये पूछ की जब वो साथ थीं तो कैसी रात थी.
न खुद सोयी न मुझे सोने दिया,
सारी रात वो चुप थीं, और मैं भी खामोश था.
दिन – भर जो पहनती थी इठला -इठला कर,
रातों को मैंने, सोना-पीतल सब झाड़ लिया.
ये मत पूछ की मैंने कितने रात लूटें सोना-चांदी,
ये पूछ की मैंने क्या -क्या नहीं लुटा.
परमीत सिंह धुरंधर
शादी हुई तो समझे खाने -खिलाने की कीमत,
माँ दौड़ती थी कौड़ ले के, हम ठोकर लगा गए.
वैसी सब्जियां क्या पकाएंगी, मेरी माँ जो पकाती है,
हम थे, आँखों में देख हाथ की तारीफ कर गए.
थकी-हारी, भूखी, जो सिर्फ मुझे देख के,
मुस्करा दे, वो है मेरी माँ, जिसे मैं कुछ दे न सका.
और महबूब की एक सालाना मुस्कान के पीछे,
हम सोना -पीतल सब कुछ चढ़ा गए.
अब उठती है, तो माँ से बात करती है घंटो,
एक हम है जो उनके लिए कब का अपनी माँ भुला गए.
शादी हुई तो समझे खाने -खिलाने की कीमत,
माँ दौड़ती थी कौड़ ले के, हम ठोकर लगा गए.
परमीत सिंह धुरंधर
फ़क़ीर मत समझो तकदीर मेरी देख के,
जवानी थी अपनी, अमीरी लूटा गए.
ऐसे -ऐसे शौक पाले थे, वो मांगती गयी,
हम सोना -पीतल सब कुछ चढ़ा गए.
परमीत सिंह धुरंधर
उनसे मिलने के पहले, खुद से मोहब्बत थी,
उनसे मिलने के बाद, खुद से नफरत होती है.
पहले हम दिन-रात सोते ही रहते थे,
अब नींदें उनकी, तन्हाई अपनी है.
की कहाँ रखे सीने में उनकी यादो को संभाल के,
अब हर तरफ, चारो और पानी ही पानी है.
बस पानी ही पानी है.
परमीत सिंह धुरंधर
वो कहते हैं की आमिर का फोटो बल्गर नहीं,
जो खुद किरण राव को बुर्क़े में रखते हैं.
हमें क्या अब सैफ समझायेंगे की मोहब्बत क्या है,
जो मोहब्बत की शुरुआत भी तालाक से करते हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
टूटते है शहंशाह के, तो ताज बनते हैं,
ये हम हैं जो उसे आंसुओं में बहा गए.
मुर्ख से मोहब्बत, उजाड़ देती है किस्मत,
हम आज भी अकेले, वो लाखो रिश्ते बना गए.
दिल्रुबावों का दिल और दामन, दोनों ही,
खुसबू से भरा है, मोहब्बत से नहीं.
मोहब्बत तो मैले – कुचले आँचल में उसके,
हम जिसके आँखों में कीचड़, ह्रदय में खंजर उतार गए.
मैं किस खुदा को सजदा दूँ और किस दर पे,
खुदा खुद दिग्भ्रमित है,
जब वो अपनी चुनर को तीज की साड़ी बता गए.
मोहब्बत का जिक्र मुझसे ना करो यारो,
इस कुरुक्षेत्र में जीतकर, वो मृतकों को काफ़िर बता गए.
घूम-घूम कर मांगते हैं,
हर गली-मोहल्ले में औरतों का सम्मान,
जवान जिस्म की चाहत में जो, अपनी बीबी को छोड़ गए.
परमीत सिंह धुरंधर
टूटने पे, शहंशाह के, ताज बन जाते हैं,
ये तो इंसान हैं जो आंसुओं में बहा देते हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
ए गुलाबो, वो गुलाबो,
सुन गुलाबो तू जरा,
मेरी छमिया, मुझको छोड़ चली,
अब घर सम्भाल तू मेरा।
छोटे- छोटे मेरे बच्चे,
देख तुझी को अम्मा बोलें।
इनके मुख को ही देख के,
अब चूल्हा जला तू मेरा।
ए गुलाबो, वो गुलाबो,
सुन गुलाबो तू जरा,
मेरी छमिया, मुझको छोड़ चली,
अब घर सम्भाल तू मेरा।
बोलेगी तो नथुनी दिला दूँ,
ना तो बोलेगी तो हँसुली।
जो आये मन में, वो करना,
करूँगा ना, टोका – टोकी,
बस साँझ -सबेरे आके कर दे,
चूल्हा -चौकी तू मेरा।
मेरी छमिया, मुझको छोड़ चली,
अब घर सम्भाल तू मेरा।
परमीत सिंह धुरंधर