खूबसूरत ह्रदय


खूबसूरत है जो ह्रदय,
वो सजता-सवरता ही नही.
सजने-सवरने वालों में,
कोई ह्रदय ही नहीं.
मैं कल भी चूड़ी लाया था,
मैं आज भी कंगन लाया हूँ.
आइना भी इंतज़ार में बैठा है,
चूल्हा है की भुझता ही नहीं.
सुबह थक कर चली गयी,
रात ऊब कर ढल गयी.
गजरा भी अब सुख गया,
बेलन-चौकी उनकी थकती ही नही.

परमीत सिंह धुरंधर

सूरज


ए कलम,
क्या लिखूं,
उनकी खूबसूरती पे.
जब भी मिलीं,
सारे दिए बुझ गए.
चाँद भी निकलता है,
तो तारो को साथ ले के.
वो तो एक सूरज थीं,
जब भी निकलीं,
सारे सितारे डूब गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कीमत


शादी हुई तो समझे खाने -खिलाने की कीमत,
माँ दौड़ती थी कौड़ ले के, हम ठोकर लगा गए.
वैसी सब्जियां क्या पकाएंगी, मेरी माँ जो पकाती है,
हम थे, आँखों में देख हाथ की तारीफ कर गए.
थकी-हारी, भूखी, जो सिर्फ मुझे देख के,
मुस्करा दे, वो है मेरी माँ, जिसे मैं कुछ दे न सका.
और महबूब की एक सालाना मुस्कान के पीछे,
हम सोना -पीतल सब कुछ चढ़ा गए.
अब उठती है, तो माँ से बात करती है घंटो,
एक हम है जो उनके लिए कब का अपनी माँ भुला गए.
शादी हुई तो समझे खाने -खिलाने की कीमत,
माँ दौड़ती थी कौड़ ले के, हम ठोकर लगा गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मुह-दिखाई


ऐसे नाहीं,
वैसे नाहीं,
ए राजा जी.
पाहिले कुछु त,
चढ़ाई हमपे,
ए राजा जी.
ए ने नाहीं,
वो ने नाहीं,
ए राजा जी.
पाहिले कुछु त,
दिखाई हमके,
ए राजा जी.
मत कुछ सिखाई,
ना बाताई,
ए राजा जी.
पाहिले रखीं,
एहिजा मुहवा-दिखाई,
ए राजा जी.

परमीत सिंह धुरंधर 

सैया हिमालय में चलके


जमाने की ये भीड़ सैया, ना भाये हमके।
चलअ बनावअ कुटिया, हिमालय में चलके।
छोड़ के अइनी हम माई के अंगना,
की बाँध के रखे तोहके अपना आंचरा।
की घरवा के ई खटपट सैया, ना भाये हमके।
चलअ बनावअ कुटिया, हिमालय में चलके।
की देहिया दुखाये ल, रात-दिन करके,
एगो तू रहतअ तअ ना कहती ई बढ़के।
पर सब केहूँ के कचर-कचर सैया, ना भाये हमके।
चलअ बनावअ कुटिया, हिमालय में चलके।

परमीत सिंह धुरंधर 

पापी मन


पापी मन,
नारी के तन,
में कितना,
उलझा है.
भूल के,
अपने माता-पिता,
जुल्फों में,
लेटा है.

परमीत सिंह धुरंधर 

सैया उहे खत्री


ए सखी हमरा ता चाहीं सैया हलवाई हो,
हर दिन छानी जलेबी, और हमके खिलाई हो.
ए सखी हमरा ता चाहीं पियवा अनाड़ी हो,
अपने ठिठुरी आ हमके ओढ़ाई रजाई हो.
ए सखी हमरा ता चाहीं बालम पनवारी हो,
बात – बात पे जे धरी हमके अक्वारी हो.
ए सखी हमरा ता चाहीं सजना बिहारी हो,
अरे बिहारी चाही तहरा, काहे हो.
ए सखी हमरा ता चाहीं सजना बिहारी हो,
लाखों में एक होलन रसिया बिहारी हो.
ए सखी हमरा चाहीं सैया उहे खत्री हो,
धुप हो – छाव हो, हर पल लगावे जो छतरी हो.

परमीत सिंह धुरंधर

दुल्हन


जो दर्पण को देख कर शर्मा जाए,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जो झुकी पलकों से भी दिल को छू जाए,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जब लौटूं मैं हल लिए काँधे पे,
दिनभर का थका हारा,
तो वो मंद – मंद मुस्करा कर,
अभिनन्दन करे दरवाजे पे,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जो काजल भी लगाये आँखों में,
मेरी आँखों में आँखे डाल कर.
जो चूड़ी भी पहने तो,
मेरी बाहों में बाहें डाल के,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जो मेरे ठन्डे चावल के थाली पे भी,
हौले-हौले पंखा बैठ के डुलाये,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।

परमीत सिंह धुरंधर

होली : मायका और ससुरा में


सोलहगो होली खेलनी मायका में,
मायका में,
पर अंग पे रंग चढ़ल ससुरा में.
पाहिले त आँखवा में आंसू आइल,
न अब माई-बहिनी भेटाई रे,
पर रोम-रोम पुलकित हो गइल,
जब नंदी मरलख पिचकारी से.
पिचकारी से.
गावं-गावं होली खेलनी मायका में,
मायका में,
पर अंग पे रंग चढ़ल ससुरा में.
दोपहर भइल फिर साँझ भइल,
सुने न कोई हमर गारी रे,
अरे चूड़ी टुटल, कंगन टुटल,
जब धइलख देवर अँकवारी में.
नाच-नाच होली खेलनी मायका में,
मायका में,
पर अंग पे रंग चढ़ल ससुरा में, परमीत

घरवाली


रात बड़ी काली है,
साथ घरवाली है,
आँखे लड़ाऊँ,
या चुपचाप सो जाऊं मैं.
पानी बरस रहा है,
छम-छम करके,
बिजली भी चमकती है,
रह-रह के,
छनका दूँ मैं इनके
पायल पावों में,
या चुपचाप सो जाऊं मैं.
आज ही आयीं हैं,
अपने मायके से,
नयी साड़ी में,
सज-धज के,
लोरी सुनाऊँ आज,
प्यार के साड़ी रात,
या चुपचाप सो जाऊं मैं, परमीत