सैया हिमालय में चलके


जमाने की ये भीड़ सैया, ना भाये हमके।
चलअ बनावअ कुटिया, हिमालय में चलके।
छोड़ के अइनी हम माई के अंगना,
की बाँध के रखे तोहके अपना आंचरा।
की घरवा के ई खटपट सैया, ना भाये हमके।
चलअ बनावअ कुटिया, हिमालय में चलके।
की देहिया दुखाये ल, रात-दिन करके,
एगो तू रहतअ तअ ना कहती ई बढ़के।
पर सब केहूँ के कचर-कचर सैया, ना भाये हमके।
चलअ बनावअ कुटिया, हिमालय में चलके।

परमीत सिंह धुरंधर 

पापी मन


पापी मन,
नारी के तन,
में कितना,
उलझा है.
भूल के,
अपने माता-पिता,
जुल्फों में,
लेटा है.

परमीत सिंह धुरंधर 

सैया उहे खत्री


ए सखी हमरा ता चाहीं सैया हलवाई हो,
हर दिन छानी जलेबी, और हमके खिलाई हो.
ए सखी हमरा ता चाहीं पियवा अनाड़ी हो,
अपने ठिठुरी आ हमके ओढ़ाई रजाई हो.
ए सखी हमरा ता चाहीं बालम पनवारी हो,
बात – बात पे जे धरी हमके अक्वारी हो.
ए सखी हमरा ता चाहीं सजना बिहारी हो,
अरे बिहारी चाही तहरा, काहे हो.
ए सखी हमरा ता चाहीं सजना बिहारी हो,
लाखों में एक होलन रसिया बिहारी हो.
ए सखी हमरा चाहीं सैया उहे खत्री हो,
धुप हो – छाव हो, हर पल लगावे जो छतरी हो.

परमीत सिंह धुरंधर

दुल्हन


जो दर्पण को देख कर शर्मा जाए,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जो झुकी पलकों से भी दिल को छू जाए,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जब लौटूं मैं हल लिए काँधे पे,
दिनभर का थका हारा,
तो वो मंद – मंद मुस्करा कर,
अभिनन्दन करे दरवाजे पे,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जो काजल भी लगाये आँखों में,
मेरी आँखों में आँखे डाल कर.
जो चूड़ी भी पहने तो,
मेरी बाहों में बाहें डाल के,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जो मेरे ठन्डे चावल के थाली पे भी,
हौले-हौले पंखा बैठ के डुलाये,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।

परमीत सिंह धुरंधर

घरवाली


रात बड़ी काली है,
साथ घरवाली है,
आँखे लड़ाऊँ,
या चुपचाप सो जाऊं मैं.
पानी बरस रहा है,
छम-छम करके,
बिजली भी चमकती है,
रह-रह के,
छनका दूँ मैं इनके
पायल पावों में,
या चुपचाप सो जाऊं मैं.
आज ही आयीं हैं,
अपने मायके से,
नयी साड़ी में,
सज-धज के,
लोरी सुनाऊँ आज,
प्यार के साड़ी रात,
या चुपचाप सो जाऊं मैं, परमीत

चाहत


तेरा चेहरा आज भी हजारो में हैं ,
इस ढलती उम्र में भी वो मेरा दर्द हैं.
एक झलक से तेरे सुकून मिल रहा ,
नाउमिदों को उमिंद मिल रहा.
ना छुपा इस हुस्न को,
चिलमन में मेरे महबूब.
आज भी परमित का दिल,
तेरी पनाह मांग रहा…..Crassa