हवायें ये मेरे हिन्द की


दिल बेख़ौफ़ है सजाए – मौत से
कोई जालिम से कह दे
की अब खंजर उतारे.
बेधड़क धड़क रहीं हैं धड़कने मेरी
कोई जालिम से कह दे
की वो अपना जोर और बढ़ाये.

आजाद रहीं हैं
आजाद ही रहेंगी ये वादियाँ।
चंचल हैं बड़ी, हवायें ये मेरे हिन्द की
कोई जालिम से कह दे
की इन्हें अब बेड़िया पहनाये।

Dedicated to Ram Prasad Bismil.

परमीत सिंह धुरंधर

ठहाके लगने लगते हैं


जहाँ भी बैठ जाए
ठहाके लगने लगते हैं.
दौर कोई भी हो
आसमा पे इंद्रधनुष खिलने लगते हैं.
दुश्मन की उड़ जाती हैं नींदे
उनके इतिहास के किस्से खलने लगते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

इस कदर तेरा ख्वाब है


सब पूछते हैं यहाँ की
क्यों मेरे हाथों में हर पल शराब हैं?
बिखर गयी है जिंदगी
इस कदर मुझे तेरा ख्वाब है.
तुझे क्या मिल गया?
इस दौलत से सजे सेज पे.
मेरी तो दुनिया बस
ग़मगीन और वीरान है.

Dedicated to Shiv Kumar Batalvi.

परमीत सिंह धुरंधर

घूँघट


जिन्हे शौक है मेरी आँखों का
वो चाहते हैं की मैं घूँघट में रहूँ।

परमीत सिंह धुरंधर

चन्दन सी मुझपर बिखर जाती हो


मैं चाँद में
तुम्हारा रूप देखता हूँ.
तुम धुप में
मेरा बदन देखती हो.

मैं पसीने से भींगा तर-बतर
और तुम चन्दन सी
मुझपर बिखर जाती हो.

कैसे खुश हो तुम
बाबुल का महल छोड़ कर?
किसान की इस झोपडी में
ऐसा भी तुम क्या पाती हो?

परमीत सिंह धुरंधर

मैं भूल गयी सैया


किस देश में है मेरे बाबुल का गावं रे
मैं भूल गयी सैया तूने मुझपे ऐसे डाला हाथ रे.
एक ररत में सब रिश्ता तुमने बदल दिया
निंद्रा से खुली पलकों को तुम बहाने लगे हो पीया।
दिन – रात अब नैना जोहे बस तेरी ही राह रे
मैं भूल गयी हर राह तूने मुझपे ऐसे डाला हाथ रे.

परमीत सिंह धुरंधर

#मधुशाला


तड़प – तड़प मेरी राहों को कोई मंजिल तो मिल जाए
गगन न सही, एक समुन्दर ही मिल जाए.
तप रही मेरी साँसों को एक प्याला तो मिल जाए
मधुशाला ना सही, गरल ही मिल जाए.

परमीत सिंह धुरंधर

नथुनिया ही बा सवा लाख के


हमार अदा पे सनम तू ऐसे ना बिछलSअ हाँ
चार दिन के जवानी बा, तू ऐसे मत छछलSअ हाँ.

एगो हमार नथुनिया ही बा सवा लाख के
बात – बात पे ऐसे मत तू जेब टटोलSअ हाँ.

सारा हमार आशिक़ बारन हमरा खेत में मजदूर
यूँ चारपाई पे हमरा तू हर रात मत आवSअ हाँ.

परमीत सिंह धुरंधर

शिव जइसन लेके आईं न बरात


ए जोगी तानी हमरो से रचाई न व्याह
शिव जइसन लेके, दुआर हमरा आईं न बरात।
काटतानी खटिया पे रात बिना अब नींद के
भौजी भइल बारी सखी, झगड़ा सब पाछे के भूल के.
केकरा से जाके कह दीं दिल के बात
रहल – रहल टिस उठे, जब पीसे बैठेनि जाँत।
ए जोगी तानी हमरो से रचाई न व्याह
शिव जइसन लेके, दुआर हमरा आईं न बरात।

लागल बारन हमरा पीछे, छपरा के धुरंधर
चढ़ल हमार जवानी पे रचSअ तारान काव्य सुन्दर – सुन्दर।
हम त बानी अपना धरम पे
लेकिन डर बाटे फिर भी हो जाईं ना हम बदनाम।
ए जोगी तानी हमरो से रचाई न व्याह
शिव जइसन लेके दुआर हमरा आईं न बरात।

This poem describe the meaning of marriage as per what I have seen in Bihar and other part of India. But now people don’t give importance to marriage until they go to court to fight against their partner.

परमीत सिंह धुरंधर

मस्त हूँ अपने रंग में


उड़ता है परिंदा
आसमा तेरी चाहत में
पर पाना ही तुझको
उसको ऐसा तो शौक नहीं।

खिलता हूँ लाखों पुष्प
रोज अपने बाग़ में
पर तोड़कर उनको माला पहनना
ऐसा मेरा तो शौक नहीं।

सागर सा तन्हा हूँ
पर मस्त हूँ अपने रंग में
नदिया का मीठापन चुराना
ऐसा मेरा तो शौक नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर