गीता


हर दर्द का रस पीना है
यही गीता का संदेस है.

विषपान से ही आता
कंठ पे कालजयी तेज है.

जितना तपती है धरती
सींचता उसे उतना ही मेघ है.

हर दर्द का रस पीना है
यही गीता का संदेस है.

परमीत सिंह धुरंधर

काफिर पढ़ने लगें आयतें


तू आँखों से पीला दे
तो जवानी लगे झूमने।
तू घूँघट जो उठा दे
तो काफिर पढ़ने लगें आयतें।
तेरे ही इशारों पे
चल रहें हैं चाँद और तारें।
तेरी एक ही नजर
कलियों को खिला दे.
गूंज रहें भौरें
तेरा ही तराना।
तू बाहों में सुला ले
तो छोड़ दें जमाने की हसरतें।

परमीत सिंह धुरंधर

You flow like a river


You flow like a river
Full of treasures
But you are not in my life
It feels like a looser.
So tell me, tell me, tell me
When will we be together?
To count stars in the sky
To give us another try.

You reflect like pure water
Fresh, sweet and milky color
But you are not in my life
So tell me, tell me, tell me
When will we be together?
To swim and catch fish
To rinse and erase past.

Parmit Singh Dhurandhar

नादाँ हैं भौरें


बड़े नादाँ हैं भौरें
परेशान है भौरें
जाने क्या ढूंढते हैं
जाने कैसा आसमान, भौरें?
इनको पता नहीं है
कलियाँ कितनी चालाक हैं।
ठग लेती हैं सबको
बस खर्चती एक मुस्कान हैं.

बड़े ब्याकुल हैं भौरें
बड़े बेताब हैं भौरें
किसी बनाने को
इनको पता ही नहीं
कलियाँ कितनी चालाक हैं
मासूम बनती हैं
पर दिल की बड़ी बईमान हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

हवायें ये मेरे हिन्द की


दिल बेख़ौफ़ है सजाए – मौत से
कोई जालिम से कह दे
की अब खंजर उतारे.
बेधड़क धड़क रहीं हैं धड़कने मेरी
कोई जालिम से कह दे
की वो अपना जोर और बढ़ाये.

आजाद रहीं हैं
आजाद ही रहेंगी ये वादियाँ।
चंचल हैं बड़ी, हवायें ये मेरे हिन्द की
कोई जालिम से कह दे
की इन्हें अब बेड़िया पहनाये।

Dedicated to Ram Prasad Bismil.

परमीत सिंह धुरंधर

ठहाके लगने लगते हैं


जहाँ भी बैठ जाए
ठहाके लगने लगते हैं.
दौर कोई भी हो
आसमा पे इंद्रधनुष खिलने लगते हैं.
दुश्मन की उड़ जाती हैं नींदे
उनके इतिहास के किस्से खलने लगते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

इस कदर तेरा ख्वाब है


सब पूछते हैं यहाँ की
क्यों मेरे हाथों में हर पल शराब हैं?
बिखर गयी है जिंदगी
इस कदर मुझे तेरा ख्वाब है.
तुझे क्या मिल गया?
इस दौलत से सजे सेज पे.
मेरी तो दुनिया बस
ग़मगीन और वीरान है.

Dedicated to Shiv Kumar Batalvi.

परमीत सिंह धुरंधर

घूँघट


जिन्हे शौक है मेरी आँखों का
वो चाहते हैं की मैं घूँघट में रहूँ।

परमीत सिंह धुरंधर

चन्दन सी मुझपर बिखर जाती हो


मैं चाँद में
तुम्हारा रूप देखता हूँ.
तुम धुप में
मेरा बदन देखती हो.

मैं पसीने से भींगा तर-बतर
और तुम चन्दन सी
मुझपर बिखर जाती हो.

कैसे खुश हो तुम
बाबुल का महल छोड़ कर?
किसान की इस झोपडी में
ऐसा भी तुम क्या पाती हो?

परमीत सिंह धुरंधर

मैं भूल गयी सैया


किस देश में है मेरे बाबुल का गावं रे
मैं भूल गयी सैया तूने मुझपे ऐसे डाला हाथ रे.
एक ररत में सब रिश्ता तुमने बदल दिया
निंद्रा से खुली पलकों को तुम बहाने लगे हो पीया।
दिन – रात अब नैना जोहे बस तेरी ही राह रे
मैं भूल गयी हर राह तूने मुझपे ऐसे डाला हाथ रे.

परमीत सिंह धुरंधर