ई ह छपरा रानी


लूट जाइ जोबना, बिकाइ खटिया
ई ह छपरा रानी, मत मिलावअ नजरिया।
यहाँ खेल -खेल में मिलिहन धुरंधर
बात – बात में यहाँ निकले दुनालिया।
खुल जाइ चोली, हेराइ नथुनिया
ई ह छपरा रानी, मत लचकावा कमरिया।
रख ल मुख पे घूँघट आ पत्थर दिल पे
ई ह छपरा रानी, यहाँ हल्दी लागेला उड़ा के चिड़िया।

परमीत सिंह धुरंधर

मुजराईल अमवा के डाल


लचकावे लू कमरिया जैसे मुजराईल अमवा के डाल
रानी बहकावा तारु जियरा, दे के नैनन से प्रेम-पैगाम।

परमीत सिंह धुरंधर

समंदर


जब दिल टुटा
तो ए समंदर
मैं भी तुम्हारी तरह लहराया।

परमीत सिंह धुरंधर

उम्र का सिला देखिये


मेरी उम्र का सिला देखिये
बहकते कदम, झुकी नजर देखिये।

मेरी उम्र का सिला देखिये
कपकपाते अधर, बलखाती कमर देखिये.

हसरते जवान, बेचैन धड़कने-२
रातों का इनका कहर देखिये।
मेरी उम्र का सिला देखिये।।

ना नैनों में नींद, ना मीठा कोई स्वप्न
मचलते अरमानों के सेज की दाहक देखिये।
मेरी उम्र का सिला देखिये।।

मेरी उम्र का सिला देखिये
हसीं गालों पे जुल्फों का भंवर देखिये।
मेरी उम्र का सिला देखिये।।

टूटे तारे रात भर जिसकी मोहब्बत में
उसके हुस्ना का ये सहर देखिये।
मेरी उम्र का सिला देखिये।।

बरसते बादल, चमकती बिजली
अम्बर में ये जुगल देखिये।
मेरी उम्र का सिला देखिये।।

परमीत सिंह धुरंधर

दाल-रोटी खायेंगें


दो तेरे नैना गोरी
ले गए दिल मेरा उड़ा के.
आ जा मेरी बाहों में
अब मायका भुला के.

दाल-रोटी खायेंगें साथ में
उसमे मक्खन मिला के.
आ जा मेरी बाहों में
अब मायका भुला के.

तू संभालना चौका – चूल्हा
मैं लाऊंगा गाय-भैंस घास चरा के.
आ जा मेरी बाहों में
अब मायका भुला के.

प्याज -रोटी खा लेंगे
होली में तुझे नई साड़ी दिला के.
आ जा मेरी बाहों में
अब मायका भुला के.

इश्क़ संग लड़ा लेंगे
पीपल तले अलाव जला के.
आ जा मेरी बाहों में
अब मायका भुला के.

शास्वत प्रेम होता है बिहारियों का अपनी पत्नियों से. और लड़कियाँ अमेरिकन से शादी कर रही हैं.
आने वाली पीढ़ियाँ तरस जाएंगी ऐसे प्रेम को. और ना ये संग्रहलाय में मिलेगा ना, और ना स्विटरज़रलैंड की बादियों में.

परमीत सिंह धुरंधर

उमिद्दों के चिराग


ये शहर
बहुत नाउम्मीदों के समंदर से गुजरा है
फिर से इसकी उमिद्दों के चिराग ना बुझावो।
तुम्हे सल्तनत बसानी है
तो बसा लो अपनी सल्तनत
मगर अपनी सत्ता के लिए फिर से अँधेरा न फैलाओ।

परमीत सिंह धुरंधर

छलकने को बेताब


ये मस्तियाँ आँखों की शराब बन गयी हैं
इन्हें और ना रोको, ये छलकने को बेताब हो गयी हैं.
तुम तो दूर हो गए चंद पल के मेहमान बन के
बस तुम्हारी चोली की कतरने रह गयी हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

आँखें


इन आँखों में
नशा है
हया है
वफ़ा है
मगर सनम
ये आँखें बेवफा हैं.

कातिल हैं, कुटिल हैं
चतुर हैं, निपुण हैं
इनमे स्वर्ग की आभा है.
मगर सनम
ये आँखें बेवफा हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

दिल


वो दिल मेरा था जिसे तुझे दे दिया था
वो जिसे तुमने तोड़ा, वो तो तेरा ही दिल था.

परमीत सिंह धुरंधर

तू भी है राणा का बंसज III-एक कुरुक्षेत्र


तू भी है राणा का बंसज
फेंक जहाँ तक भाला जाए.
मधुवन के शौक़ीन सभी हैं
तो रण में बिगुल कौन बजाए?
धर्म-अधर्म की बाते छोड़
गांडीव पे अब तीर चढ़ा.
उनकी आँखों में बस छल है
फिर क्यों तू अपना प्रेम दिखाए?
छल-कपट में पारंगत वो
तू फिर क्यों नियम गिनाए।
वो चढ़ आए रणभूमि तक
लहू के तेरे प्यासे होकर।
फिर क्यों तू खुद को यूँ
रिश्तों में जकड़ा पाए.
तू भी है राणा का बंसज
फेंक जहाँ तक भाला जाए.

Two lines (तू भी है राणा का बंसज. फेंक जहाँ तक भाला जाए. ) were written by Dr. Kumar Vishwas.

परमीत सिंह धुरंधर