यहाँ बाजार लगता है


मैं खामोश हूँ, दिल बेचैन रहता है
गुनाह मेरे दिल का, मेरा रब जानता है.

हर दिल में डर है, राज महफूज है या नहीं
इस दौर में हर कोई, शक से बीमार लगता है.

सब कहते हैं उन्हें दौलत नहीं, सच्चा प्यार चाहिए
जिनकी रातों के लिए, यहाँ बाजार लगता है.

परमीत सिंह धुरंधर

तीखी नजर


पतली कमर पे तीखी नजर लेकर
क्या करोगी रानी?

छमक – छमक के चलती हो
कहाँ बिजली गिराओगी रानी?

प्यासे- प्यासे कब से है हम
अधरों से दो बूंदें कब छलकावोगी रानी?

परमीत सिंह धुरंधर

नून – रोटी खाउंगीं


रंग- तरंग आके संग मेरे बैठ गयी
एक हवा भी कहीं से, मेरी जुल्फों में बंध गयी.
दरिया ने माँगा है पाँव मेरे चूमने को
सागर ने सन्देश भेजा है ख्वाब मेरे पालने को.
और मेरे वक्षों पे चाँद की नजर गड़ गयी.

भौरें सजा रहे हैं पराग ला – लाकर मेरे अधरों को
और कलियाँ खिल – खिलकर मेरे अंगों पे गिर रही.
दिन मांगता है चुम्बन मेरे गालों का
और मेरे नयनों में स्वयं निशा है उतर गयी.

ना दरिया को पाँव दूंगी, ना सागर को ख्वाब
अल्हड मेरी जवानी, करुँगी Crassa पे कुर्बान।
मेरा रसिया है बस छपरा का धुरंधर
जीवन संग उसके गुजार दूंगी
नून – रोटी खाउंगीं, पर न उसको दगा दूंगी।

परमीत सिंह धुरंधर

हरी मिर्च न लगाया करो


मीठे – मीठे अरमानों पे मेरे, हरी मिर्च न लगाया करो
हल्दी पीस के बैठी हूँ बालाम, यूँ सौतन से न छपवाया करो.

गरम किया है तेल सरसों का, गूँथ के बैठी हूँ चंपा – चमेली
मेरे ह्रदय के पुष्पित पुष्पों को, यूँ सौतन का गजरा न बनाया करो.

परमीत सिंह धुरंधर

बिखरापन


रातों में सूनापन
दिन में अधूरापन
ए जिंदगी अब तू बता
ये कैसा दीवानापन?

साँसों में प्यास
आँखों में ख्वाब
ए जिंदगी अब तू बता
ये कैसा बंजारापन?

किताबों में उसका चेहरा
राहों में उसका दुप्पटा
ए जिंदगी अब तू बता
ये कैसा आवारापन?

जब दिल ही हो बेवफा
तो शिकायत किसे करें
ए जिंदगी अब तू बता
ये कैसा बिखरापन?

परमीत सिंह धुरंधर

झूठे इंतजार में


पीता बहुत हूँ मैं तेरे नाम पे
जिन्दा हूँ अब तक बस तेरे आस में.

पता है की तुम अब कभी ना लौटोगे
पर मजा बहुत है इस झूठे इंतजार में.

परमीत सिंह धुरंधर

शोहरत


अभी इतना भी तन्हा नहीं हुआ है Crassa
उनके शोहरत में शामिल अंगों को है मैंने गढ़ा.

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न बेमिसाल था


इश्क़ ना उनसे हुई तो नशा किताबों में ढूंढा
नाम शमा हासमी तो दुआ मजारों पे पढ़ा.

किस्मत से जंग में फ़कीर है हर कोई
उनका हुस्न बेमिसाल था तो साथी दौलत को चुना।

परमीत सिंह धुरंधर

हाले – जिंदगी


दास्ताने – जिंदगी तो सबने लिखी है
मैं पढ़ने बैठा हूँ दास्ताने – जिंदगी।

शौक समंदर का रखता हूँ
इस शौक ने कर दिया तन्हा जिंदगी।

उलझनों में उलझ के जो थम जाते हैं
कब कोई उनसे पूछता है फिर हाले – जिंदगी?

उनकी निगाहों को देख समझ गया था
ख़ाक के सिवा कुछ नहीं मोहब्बत में जिंदगी।

दुवाओं का असर है या कर्म का फल है
बेगानों की बस्ती में अब तक टिकी है जिंदगी।

परमीत सिंह धुरंधर

गरीबों की सुन ले ए दाता-III


टूटे हैं सारे ख्वाब इनके
बनके आँसू
छलक -छलक के.
जाने कैसे ज़िंदा हैं ये
जीवन में इतना भटक – भटक के.
कौन तोड़ेगा इनकी बेड़िया
एक तेरे सिवा
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।
इनकी आँखों के आगे
रहता है बस अँधेरा।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।

परमीत सिंह धुरंधर