अभी तो तुम दुल्हन सी मासूम हो
कल से बन जाओगी प्रचंड – भयंकर।

अभी तुम्हारी निगाहें शर्म से झुकीं हैं
कल से उगलेंगी ये ज्वालायें निरंतर।

किसने लिखा है जाने क्या सोचकर तुम्हे अबला?
शरण में तुम्हारे स्यवं है महादेव – महेश्वर।

माया के आगे तुम्हारे भला कौन इस जगत में?
तुमसे बड़ा ना कोई हुआ ब्रह्माण्ड में धुरंधर।

बेवफाई के दर्द से भक्ति के आनंद तक


नुसरत फ़तेह अली खान साहेब ने बेवफाई के दर्द को भक्ति के आनंद में बदल दिया है. टूटे दिल को भी जब दर्द में झूम उठने का संगीत मिले तो वही भक्ति है.

परमीत सिंह धुरंधर

इस चांदनी रात में


जानता हूँ तुम्हारा हर इरादा सनम
इस चांदनी रात में, किससे वादा किया है
और किससे आज मिलने जाओगे?

Dedicated to Nusrat Fateh Ali Khan

परमीत सिंह धुरंधर

घूँघट


चाँद बनो तुम तो रात का फिर नशा भी हो जाए
ख्वाब बनो तुम तो धड़कनों को मुकाम मिल जाए.

कब तक रखोगे यूँ हमसे घूँघट मुख पे रानी
ये घूँघट हेट तो अधरों का मिलन भी हो जाय.

परमीत सिंह धुरंधर

यहाँ बाजार लगता है


मैं खामोश हूँ, दिल बेचैन रहता है
गुनाह मेरे दिल का, मेरा रब जानता है.

हर दिल में डर है, राज महफूज है या नहीं
इस दौर में हर कोई, शक से बीमार लगता है.

सब कहते हैं उन्हें दौलत नहीं, सच्चा प्यार चाहिए
जिनकी रातों के लिए, यहाँ बाजार लगता है.

परमीत सिंह धुरंधर

तीखी नजर


पतली कमर पे तीखी नजर लेकर
क्या करोगी रानी?

छमक – छमक के चलती हो
कहाँ बिजली गिराओगी रानी?

प्यासे- प्यासे कब से है हम
अधरों से दो बूंदें कब छलकावोगी रानी?

परमीत सिंह धुरंधर

नून – रोटी खाउंगीं


रंग- तरंग आके संग मेरे बैठ गयी
एक हवा भी कहीं से, मेरी जुल्फों में बंध गयी.
दरिया ने माँगा है पाँव मेरे चूमने को
सागर ने सन्देश भेजा है ख्वाब मेरे पालने को.
और मेरे वक्षों पे चाँद की नजर गड़ गयी.

भौरें सजा रहे हैं पराग ला – लाकर मेरे अधरों को
और कलियाँ खिल – खिलकर मेरे अंगों पे गिर रही.
दिन मांगता है चुम्बन मेरे गालों का
और मेरे नयनों में स्वयं निशा है उतर गयी.

ना दरिया को पाँव दूंगी, ना सागर को ख्वाब
अल्हड मेरी जवानी, करुँगी Crassa पे कुर्बान।
मेरा रसिया है बस छपरा का धुरंधर
जीवन संग उसके गुजार दूंगी
नून – रोटी खाउंगीं, पर न उसको दगा दूंगी।

परमीत सिंह धुरंधर

हरी मिर्च न लगाया करो


मीठे – मीठे अरमानों पे मेरे, हरी मिर्च न लगाया करो
हल्दी पीस के बैठी हूँ बालाम, यूँ सौतन से न छपवाया करो.

गरम किया है तेल सरसों का, गूँथ के बैठी हूँ चंपा – चमेली
मेरे ह्रदय के पुष्पित पुष्पों को, यूँ सौतन का गजरा न बनाया करो.

परमीत सिंह धुरंधर

बिखरापन


रातों में सूनापन
दिन में अधूरापन
ए जिंदगी अब तू बता
ये कैसा दीवानापन?

साँसों में प्यास
आँखों में ख्वाब
ए जिंदगी अब तू बता
ये कैसा बंजारापन?

किताबों में उसका चेहरा
राहों में उसका दुप्पटा
ए जिंदगी अब तू बता
ये कैसा आवारापन?

जब दिल ही हो बेवफा
तो शिकायत किसे करें
ए जिंदगी अब तू बता
ये कैसा बिखरापन?

परमीत सिंह धुरंधर

झूठे इंतजार में


पीता बहुत हूँ मैं तेरे नाम पे
जिन्दा हूँ अब तक बस तेरे आस में.

पता है की तुम अब कभी ना लौटोगे
पर मजा बहुत है इस झूठे इंतजार में.

परमीत सिंह धुरंधर