दसरथ-पुत्र हूँ मैं


ए समंदर मेरे, मेरा शौक रख
माना की अकेला हूँ अभी
पर फिर भी तू मेरा खौफ रख.

तेरे तट पे अभी भिक्षुक हूँ मैं
पर दसरथ-पुत्र हूँ मैं
उसका तो तू मान रख.

गुजरा है मेरा भी कारवां
जय – जयकारों के उद्घोष से.
अगर तू अनजान है तो
बेसक यूँ ही मौन रख.

मगर मेरी तीरों को अब भी
आशीष प्राप्त है महादेव का.
अतः निष्कंटक छोड़ दे मेरी राहें
अन्यथा रघुवंश से युद्ध का गर्व प्राप्त कर.

परमीत सिंह धुरंधर

मंजिल


तन्हाइयों से भरी रही हैं यहाँ तक मेरी राहें
पर मंजिल पे खामोशियाँ भी मदहोस कर रही हैं.
तू नजरों के सामने आये या ना आये सही
तेरे ख्वाब मुझे ज़िंदा रख रही हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

धारा 497 (section 497 of IPC)-2


प्रेम है अगर तो आलिंगन होना चाहिए
अधर कुंवारे हो या विवाहित हों
अधरों का चुम्बन होना चाहिए।
भूल जाइये की क्या है वेदों में लिखा?
अब वेदों का पठन -पाठन रुकना चाहिए।
हम तय करेंगें की वेदों का
कितना मान होना चाहिए?
फूटते हैं जो पठाखे दिवाली पे
बस वो ही कानों को कर्कश लगते हैं
अब राम की वन्दना भी मूक – कंठ होना चाहिए।
और व्याख्या है यही हिन्द के विधान की
हम जिसे कह दे वही बस सेक्युलर होना चाहिए।

परमीत सिंह धुरंधर

#metoo


उन्ही नजरों से नशा लीजिये
जो बैठें रहते है इंतजार में चौखट पे.
पिलाने को तो कई है तैयार बाजार में
पर ख़तरा भी है #metoo का इश्क़ में.

परमीत सिंह धुरंधर

सींचती रहे मुझे


जो धुप में छाव बन कर
जो दर्द में माँ बनकर
सींचती रहे मुझे।

जो जग में पिता बन कर
युद्ध में गुरु बनकर
शिक्षित करती रहे मुझे।

जो सुख में प्रेयसी बन कर
जो दुःख में मित्र बन कर
समेटती रहे मुझे।

परमीत सिंह धुरंधर

कौन है ?


कौन हमारी नींदों में विरहा के ये धुन बजाता?
कौन है जो मेरे रक्त का, यूँ निरंतर ताप बढ़ाता?

कौन है जो मिलन के ये आस जगा के छुप रहा?
कौन है जो मुझको जगा के यूँ, स्वयं सो रहा?

कौन है जो नैनों के बाण से ह्रदय मेरा बेंध रहा?
कौन है जो मेहँदी की लाली से ख़्वाबों को सींच रहा?

कौन है जो मुझको बेशर्म बना के स्वयं शर्म में बांध रहा?
कौन है जो प्रेम पग बढ़ा के मुझको यूँ छल रहा?

 

परमीत सिंह धुरंधर

जो अनंत, असीमित हो


जो अनंत, असीमित हो
जो निरंतर प्रवाहित हो.
जो दुःख में, सुख में
अकल्पनीय, अकल्पित हो.
जो मधुर से मधुरतम
प्रेम में प्रीत हो.

जो जड़ से जड़ित,
प्रेम से पीड़ित हो.
जो प्रेयसी के बाहों में भी
विरह से ग्रसित हो.
जो प्रेम के मिलन को
निरंतर अंकुरित हो.

जिसके नाम पे दुनिया
भय से कम्पित हो.
जो उषा में, निशा में,
हर एक दिशा में,
सूर्य सा अबिलम्ब उदित हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

निगाहों से मोहब्बत, वो बचपन में था


अब शौक है अधरों का मुझको
निगाहों से मोहब्बत, वो बचपन में था.
तुम भी सम्भालों अपना दुप्पटा जरा
इन्हे उड़ाने का शौक तो हवाओं को था.

क्यों बोझिल हो जाती हैं?
शर्म से पलके पलभर में.
जिन्हें जमाने से लड़ाने का शौक तुमको था.
और अब तक बैठा है कुंवारा Crassa
वफाए – मोहब्बत, तुमसे जमाने को था.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे बाहर कुछ भी नहीं


मैंने प्यार में क्या – क्या गवाया?
इसकी कोई गिनती नहीं।
सब मेरे अंदर है,
मेरे बाहर कुछ भी नहीं।

समेट लूँ, समेट लूँ, समेट लूँ
दुनिया की हर ख़ुशी
हर कोई यही चाहता है आज.
मेरी ख़ुशी क्या है?
मैंने आज तक समझा ही नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी की पूरी जरूरतें नहीं होती


हर किसी की मोहब्बत में ख्वाइशें नहीं होती
बिस्तर तो होती है पर सिलवटे नहीं होती।

क्या संभाले कोई जिंदगी को ?
सँभालने से जिंदगी की पूरी जरूरतें नहीं होती।

शिकायतें बढ़ती जा रही हैं उसकी
हर रात जिंदगी के साथ.

अब चाँद कहने और चुम्बनों से
दूर उनकी शिकायतें नहीं होती।

 

परमीत सिंह धुरंधर