इस शहर के हर मोड़ पे अकेला – अकेला सा महसूस करता हूँ
घर किसी का भी टूटे, मैं टुटा – टुटा सा महसूस करता हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
इस शहर के हर मोड़ पे अकेला – अकेला सा महसूस करता हूँ
घर किसी का भी टूटे, मैं टुटा – टुटा सा महसूस करता हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
शहर में जो भी ख्वाब हैं
सब उदास हैं.
घरों में बालकनी है
बालकनी में पौधें हैं
पौधों पे फूल और फूल पे तितलियाँ हैं
पर ना वो सुबह है ना वो शाम है.
शहर में जो भी ख्वाब हैं
सब उदास हैं.
अजीबो-गरीब रिश्ते हैं
झगड़ालू बीबी तो भागती प्रेमिका है
बिना शादी के होते बच्चे हैं
पर किसी को नहीं पता
कैसे किसके माँ – बाप हैं?
शहर में जो भी ख्वाब हैं
सब उदास हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
जिसको भी आता है घोंषला बनाना
इस शहर में उसी का घोंषला नहीं है.
कैसे सवारोगे किस्मत को Crassa?
किस्मत में बस यही एक चीज़ लिखी नहीं है.
उड़ रहे हैं बहुत परिंदे आसमा में
मगर दूर – दूर तक इनका कोई आशियाना नहीं है.
संभालना सिख लो गलियों में ही
ये शहर देता दोबारा मौका नहीं है.
उजड़ा है मेरा गुलिस्ता यहीं पे कभी
मगर शहर ये अब भी शर्मिन्दा नहीं है.
परमीत सिंह धुरंधर
तुम लता बन कर बाँध रही हो
मैं तना बन कर छुप रहा हूँ.
तुम पुष्प सी पुलकित हो कर
मेरी डालो पे खुशबु बिखेर रही हो.
और Crassa कण – कण में
पिंक – पिंक होकर बिखर रहा है.
ए समंदर मेरे, मेरा शौक रख
माना की अकेला हूँ अभी
पर फिर भी तू मेरा खौफ रख.
तेरे तट पे अभी भिक्षुक हूँ मैं
पर दसरथ-पुत्र हूँ मैं
उसका तो तू मान रख.
गुजरा है मेरा भी कारवां
जय – जयकारों के उद्घोष से.
अगर तू अनजान है तो
बेसक यूँ ही मौन रख.
मगर मेरी तीरों को अब भी
आशीष प्राप्त है महादेव का.
अतः निष्कंटक छोड़ दे मेरी राहें
अन्यथा रघुवंश से युद्ध का गर्व प्राप्त कर.
परमीत सिंह धुरंधर
तन्हाइयों से भरी रही हैं यहाँ तक मेरी राहें
पर मंजिल पे खामोशियाँ भी मदहोस कर रही हैं.
तू नजरों के सामने आये या ना आये सही
तेरे ख्वाब मुझे ज़िंदा रख रही हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
प्रेम है अगर तो आलिंगन होना चाहिए
अधर कुंवारे हो या विवाहित हों
अधरों का चुम्बन होना चाहिए।
भूल जाइये की क्या है वेदों में लिखा?
अब वेदों का पठन -पाठन रुकना चाहिए।
हम तय करेंगें की वेदों का
कितना मान होना चाहिए?
फूटते हैं जो पठाखे दिवाली पे
बस वो ही कानों को कर्कश लगते हैं
अब राम की वन्दना भी मूक – कंठ होना चाहिए।
और व्याख्या है यही हिन्द के विधान की
हम जिसे कह दे वही बस सेक्युलर होना चाहिए।
परमीत सिंह धुरंधर
उन्ही नजरों से नशा लीजिये
जो बैठें रहते है इंतजार में चौखट पे.
पिलाने को तो कई है तैयार बाजार में
पर ख़तरा भी है #metoo का इश्क़ में.
परमीत सिंह धुरंधर
जो धुप में छाव बन कर
जो दर्द में माँ बनकर
सींचती रहे मुझे।
जो जग में पिता बन कर
युद्ध में गुरु बनकर
शिक्षित करती रहे मुझे।
जो सुख में प्रेयसी बन कर
जो दुःख में मित्र बन कर
समेटती रहे मुझे।
परमीत सिंह धुरंधर
कौन हमारी नींदों में विरहा के ये धुन बजाता?
कौन है जो मेरे रक्त का, यूँ निरंतर ताप बढ़ाता?
कौन है जो मिलन के ये आस जगा के छुप रहा?
कौन है जो मुझको जगा के यूँ, स्वयं सो रहा?
कौन है जो नैनों के बाण से ह्रदय मेरा बेंध रहा?
कौन है जो मेहँदी की लाली से ख़्वाबों को सींच रहा?
कौन है जो मुझको बेशर्म बना के स्वयं शर्म में बांध रहा?
कौन है जो प्रेम पग बढ़ा के मुझको यूँ छल रहा?
परमीत सिंह धुरंधर