दू ए गो नथुनिया में लूट अ तारअ राजा
रात में चैन आ दिन में मजा.
कइला बदनाम, भइल सारा जिला में हल्ला
बाली उमर में ही दे दिहलअ साजा।
छुप के – छुपा के आवतानी तहरा से मिले
ओपर तू रखअतार किवाड़ खुला।
परमीत सिंह धुरंधर
दू ए गो नथुनिया में लूट अ तारअ राजा
रात में चैन आ दिन में मजा.
कइला बदनाम, भइल सारा जिला में हल्ला
बाली उमर में ही दे दिहलअ साजा।
छुप के – छुपा के आवतानी तहरा से मिले
ओपर तू रखअतार किवाड़ खुला।
परमीत सिंह धुरंधर
सब चाहते हैं जानना की खुदा कहाँ है?
जन्नत कहाँ है?
माँ जिधर कदम रख दे
उससे हसीन भला और क्या है?
परमीत सिंह धुरंधर
अभी बाली बा उमर राजा जी
काहे दे तानी हमके अइसन सजा राजा जी.
रोजे आवेनी छुप के – छुपा के सबसे
आ रउरा रखsतानी किवाड़ खुला राजा जी.
हमरा पे मत ऐसे जुल्म बढ़ाई राजा जी
ना त हम हो जाएम बदनाम बड़ा राजा जी.
परमीत सिंह धुरंधर
जब इश्क़ तन्हा हुआ तो समंदर बन गए
जब इश्क़ बेवफा से हुआ तो कलंदर बन गए.
यूँ ही नहीं कहता जमाना की बड़ा शातिर हूँ मैं
दर्द को पी कर हम धुरंधर बन गए.
परमीत सिंह धुरंधर
तन्हाइयों में उर्वसी बनकर
अपने तीक्ष्ण नैनों से ह्रदय में
तरंगे उठाने वाली
विरह की तपिश में मुझे झोंककर
संसार के सम्मुख
मेनका बनकर मुझसे मुख मोड़ लेती है.
जो कल तक प्रेम, धर्म, कर्तव्य, नारी – सम्मान
का बोध कराती, ज्ञान देती
वो स्वर्ग के सुख के लिए
मातृत्व, स्त्रीत्व और गृहस्थ धर्म को त्याग कर
इंद्रा की सभा में नृत्यांगना बनने का
प्रस्ताव स्वीकार कर लेती है.
परमीत सिंह धुरंधर
जिंदगी ही दर्द है, दर्द ही जिंदगी
हमने तो बस उसे कागज़ पे उतार दिया।
परमीत सिंह धुरंधर
हारे ऐसे की जमाने ने मज़ाक बना दिया
फिर जीते भी ऐसे की जमाना मज़ाक बन गया.
मगर इस हार – जीत में दोस्तों
हाथों से कुछ फिसल गया.
यह सही है की वक्त भर देता है जख्मों को
मगर वक्त ने ही जाने क्यों जख्मों को हरा छोड़ दिया?
हमने ख्वाब सजाएं जिन हाथों को थामकर
उन्ही हाथों ने, उन ख़्वाबों को हमसे चुरा लिया।
इश्क़ जब भी बेपनाह हुआ है
जमाने से पहले हुस्न ने उसे ठोकर लगा दिया।
चंद मुलाकातों का शौक मोहब्बत नहीं
क्या समझेंगे वो जिन्होंने हर रात नया सेज सजा लिया?
तड़प क्या होती है दिल की उस जिस्म से पूछो?
जिसकी मोहब्बत को किसी और ने अपनी दुल्हन बना लिया।
वो चढ़ गयी डोली बिना एक पल भी सोचे
जाने हुस्न ने कैसे खुद को इतना कठोर बना लिया?
परमीत सिंह धुरंधर
आप उगाने लगे हैं अपने घर में हरी मिर्चियाँ
तो उनका क्या होगा?
जिनको अधरों से लगाकर हम आज तक सिसक रहे हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
किताबों में पढ़ते रहे ताउम्र जवानियों के किस्से
मगर जब ढलकी तेरी चुनर तो समझे जवानियों के किस्से।
परमीत सिंह धुरंधर
शहर भर से मेरा पता मत पूछ
ये दुश्मनी खानदानी है.
पिलाना है तो खुलकर पीला
ये अपनी प्यास पुरानी है.
तेरे जिस्म पे वो रख सकते हैं
सोने – चांदी, हीरे – जवाहरात
पर तुम्हारे वक्षों पे वो दाग
वो तो अमिट एक निशानी है..
परमीत सिंह धुरंधर