अधरों पे आग


मैं अपनी जुल्फों में बांधकर उनको,
जो इतराई,
वो मेरी नस – नस को झनका गए.
मैं ह्रदय चुराकर जो संवरने लगी,
वो दर्पण को सौतन मेरी बना गए.
प्यासा बनाकर, उनको जो छोड़ा मैंने,
वो बाबुल को मेरे पराया बना गए.
रुलाया जिसको इश्क़ में जी भरकर मैंने,
वो अधरों पे मेरे आग जला गए.

परमीत सिंह धुरंधर

संघर्ष और चाहत


संघर्ष ही जीवन का मिठास है, दोस्तों,
हर नदिया प्यासी, सागर के खाड़ेपन को.
चकोर की चाहत वो चाँद दूर का,
जिसके आँगन में सितारे और दामन में कई दाग हैं।

परमीत सिंह धुरंधर

वेणी


मेरे इश्क़ को तेरा ख़्वाब मिले,
तो मैं रात भर यूँ ही जलता रहूँ।
तू चाँद बन कर मुझसे अगर दूर भी रहे,
तो मैं चकोर बनकर, तरसता हुआ,
भी जीवन को जीता रहूँ।
मेरे उपवन के फूलों से,
तू जो अपनी वेणी को गुंथे।
तो मैं काँटों को यूँ ही जीवन भर,
अपने श्रम से सींचता रहूँ।

परमीत सिंह धुरंधर

विजय श्री


मैं सागर की लहरों,
को बाँध के पी जाऊं।
मगर मेरी प्यास,
तेरे अधरों से बुझती है प्रिये।
मैं हिमालय के मस्तक पे, एक ही बार में,
अपने विजय का ध्वज लहराऊं।
पर विजय श्री,
तुम्हारे बाहों में मिलती है प्रिये।
मैं बादलों को रोक कर,
सावन को बरसा दूँ।
मगर भिगनें का मज़ा,
तेरी जुल्फों में है प्रिये।
मैं पुष्पों को चुम कर,
भौरां बन जाऊं।
मगर मैं झूमता तेरी वक्षों पे हूँ प्रिये।
तू ही मुझे पूर्ण करती है,
तू ही मुझे सम्पूर्ण करती है।
तुझसे मिल कर ही,
मुझे जिंदगी मिली है प्रिये।

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे साहस की सहचारिणी


तुम ह्रदय की स्वामिनी,
धमनियों की रागिनी,
नस – नस का मेरे स्पंदन हो,
तुम हो मेरे मन की कामिनी।
चक्षुओं की मेरी रौशनी,
मेरे अधरों पे प्रज्जवलित अग्नि,
मेरे साँसों की ऊष्मा हो,
तुम हो मेरे साहस की सहचारिणी।

परमीत सिंह धुरंधर

पुणे – प्रेम


पुणे के अपने वीरान खंडहरों में,
एक आलिशान महल बनाकर।
तुम्हे अपने बाहों में भरकर प्रिये,
जब मैं चुम्बन करूँगा।
तो बादल उमड़ – उमड़ कर,
और कलियाँ कम्पित हो कर,
क्षितिज तक लालिमा प्रदान करेंगे।
जब तुम्हारी भीगी – भीगी,
जुल्फों की हर गाँठ को,
मेरी साँसें अपनी ऊष्मा प्रदान करेंगी।
तो हर दिशा से हवाएँ प्रखर हो कर,
मेरु पर्वत तक,
नस – नस में कम्पन का आवाहन करेंगीं।
बस इंतज़ार करों अपने मिलन का,
मेरे प्रेम के मधुर बाणों पे पुलकित,
तुम्हारे योवन से।
उषा से रात्रि तक,
स्वयं प्रकृति भी रंज करेंगी।

परमीत सिंह धुरंधर

बस तुम मेरे साथ रहो प्रिये


बस सूरज प्रखर हो अम्बर में,
मैं हर युद्ध जीतता चला जाऊँगा।
रात चाहे जितनी लम्बी हो,
मैं रौशनी बनकर सुबहा लाऊंगा।
बस तुम मेरे साथ रहो प्रिये,
मैं हर गम को,
खुशियों का आँचल पहनाऊंगा।
मेरी भूख – प्यास सब, अब तुम्ही हो,
तुम्हारे नैनों से जीवन मेरा।
तुम यूँ हैं मुस्करा कर मिलती रहो,
मैं पतझड़ को बसंत बनाऊंगा।

परमीत सिंह धुरंधर

सौतनें


कहीं दुपट्टा लपेटते – लपेटते,
वो परायी हो गयीं.
कहीं कंचे खेलते – खेलते,
हम जवान हो गए.
वो जब तक लौटीं,
अपने दो बच्चों के संग.
हम भी किसी के,
शौहर हो गए.
कभी काजल की डिबिया,
दिया था जो स्कूल में,
उनकी आँखों का रंग देख कर.
आज उसी को लगाती हैं,
मेरी बेगम की आँखों में,
उनकी दिलो-जान बन कर.
की बांटती है हर,
सुख-दुःख, दर्द की बातें.
बस वो ही एक राज,
अपने सीने में रख कर.
कौन कहता है की,
सौतनें, बहने नहीं होतीं.
बस रात के सफर में,
कभी साथ नहीं होतीं.

परमीत सिंह धुरंधर

लड़की काश्मीर की


तुम लड़की काश्मीर की,
मैं लड़का बिहार का.
आ जा खेल ले थोड़ा-थोड़ा,
ये खेल प्रेम का.
तुम लड़की काश्मीर की,
मैं लड़का बिहार का.
आ जा घर बसा लें,
हम दिल्ली में यहाँ।
तुम धीरे-धीरे चलना,
हर सुबह मुस्करा के.
मैं तुमको चाय पिलाऊं,
तुम मुझको खाना खिलाना.
तुम लड़की काश्मीर की,
मैं लड़का बिहार का.
आ जा खेल ले थोड़ा-थोड़ा,
ये खेल प्रेम का.
तुम सर्दी कहो तो,
मैं सर्दी कह दूंगा।
भरी दुपहरिया में,
कम्बल ओढ़ के हाँ.
तुम लड़की काश्मीर की,
मैं लड़का बिहार का.
आ जा घर बसा लें,
हम दिल्ली में यहाँ.
रोज तुम्हारी नखरों पे,
सुबहा-शाम हो.
रोज हमारी फरमाइशों,
से सजी रात हो.
तुम लड़की काश्मीर की,
मैं लड़का बिहार का.
आ जा खेल ले थोड़ा-थोड़ा,
ये खेल प्रेम का.
हर रोज एक नई,
नथुनी मैं तुमको दूंगा.
तुम सज-संवर के,
मुझसे मिलती रहना।
तुम लड़की काश्मीर की,
मैं लड़का बिहार का.
आ जा घर बसा लें,
हम दिल्ली में यहाँ.

परमीत सिंह धुरंधर

उन्नत वक्ष


तुम्हारे उन्नत-उन्नत वक्षों पे,
फीका है चाँद अम्बर का.
तुम्हे मय की क्या जरुरत,
नशा है तुमसे मयखाने का.
तुम चलो तो दरिया सुख जाए,
प्यास बढ़ जाए सागर का.
तुम्हारे गहरे-गहरे नैनों पे,
दम्भ है झूठा सागर का.
तुम्हे मय की क्या जरुरत,
नशा है तुमसे मयखाने का.
तुम्हारे नितम्बों पे झूलती ये चोटी,
जैसे चन्दन बन का मतवाला भुजंग।
तुम्हारे मधुर – मधुर इन अधरों के आगे,
देवों का अमृत विषैला है.
तुम्हे मय की क्या जरुरत,
नशा है तुमसे मयखाने का.

परमीत सिंह धुरंधर