वो क्या समझेंगें मेरी मोहब्बत को,
जो बस शाहजहाँ का नाम उछालतें हैं.
हम तो बिना मुमताज़ के ही,
इश्क़ में अपना सब कुछ लूटा गए.
परमीत सिंह धुरंधर
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वो क्या समझेंगें मेरी मोहब्बत को,
जो बस शाहजहाँ का नाम उछालतें हैं.
हम तो बिना मुमताज़ के ही,
इश्क़ में अपना सब कुछ लूटा गए.
परमीत सिंह धुरंधर
अभी तो तुझसे मिली हूँ मैं,
अभी तो हाँ खिली हूँ मैं.
अभी तो चाँद बनी हूँ मैं,
अभी तो महफ़िल में जली हूँ मैं.
अभी न मुझसे ऐसी बात कर,
ए मुसाफिर, मुझे बाँध कर.
अभी तो आँख लड़ी है ये,
अभी तो साँझ ढली हैं ये .
थोड़ा और खुमार चढ़ने दे,
अभी तो साँसे बहकी हैं ये.
मुझे ना, घर की राह दिखा,
ना, बाबुल का नाम बता.
अभी तो प्यास जगी है मेरी,
अभी तो चाहत बढ़ी है मेरी.
परमीत सिंह धुरंधर
अब इश्क़ में,
उनसे कुछ कहने-सुनने का,
कोई रास्ता बचा ही नहीं।
उनकी नजर में, हम मुर्दा हैं,
और मेरी नजर में,
अब वो सीता ही नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
तेरी नखरों पे मैं मचलू,
मेरी बाहों में तू छलके।
कई रात गुजार दे रानी,
हम एक ही कपड़े में.
परमीत सिंह धुरंधर
प्रिये प्यार करेंगे,
पूरी रात करेंगे।
एक दीप जला कर,
हम साथ रहेंगे।
सुबह हो जब, तेरी आँचल में मैं,
रात हो जब, मेरी बाहों में तू.
हर पल में तेरी,
साँसों का एहसास करेंगे।
मौसम हो एक सर्दी की,
या धुप खिली हो गर्मी वाली।
बरसात में भी, तेरी आँखों का,
हम जाम पिएंगे।
परमीत सिंह धुरंधर
जिंदगी है मेरी, गुजर ही जायेगी, गम न करो,
बस, तुम्हारी आँखों में ये काजल कभी काम न हो.
परमीत सिंह धुरंधर
मेरे सीने पे, उनकी अधरों का चुम्बन,
अब कोई तीर भी चलाये, तो क्या गम है.
एक बार तैर गए ये दरिया,
अब डूब भी जाएँ, तो क्या गम है.
मौत तो आएगी, अगर जिंदगी है,
मौत ही अगर जिंदगी हो, तो क्या गम है.
परमीत सिंह धुरंधर
तेरी बाहों में सरकते-सरकते,
सुबह से शाम हो गयी.
अब भूख लगी है मुझे,
माँ की फिर याद आ गयी.
तेरे तन की खुसबू ,
भी अब मीठी नहीं लगती।
वो लड्डू मेरी माँ के हाथों की,
फिर से मुझे याद आ गयी.
परमीत सिंह धुरंधर
उनसे दुश्मनी, मोहब्बत में,
जैसे दुरी सितारों की, चाँद से.
दूर से देखने में,
वो मेरे करीब बैठी हैं.
मगर करीब रह के भी, रखती हैं,
चाँद फासला अपनी साँसों में.
परमीत सिंह धुरंधर
नदियां उछलती हैं तो किनारे डूब जाते हैं,
हुस्न सवरता हैं, तो दर्पण टूट जाते हैं.
मोहब्बत बाहों का बाहों से मिलान नहीं है यार,
ये तो वो रिश्ता हैं,
जहाँ बिना जाम के ही लैब भींग जाते हैं.
और हलक सूखे-सूखे, प्यासे रहते हैं,
हम जीते हैं उनके इंतज़ार में,
जो अपनी हर राह को जुदा किये बैठते हैं.
परमीत सिंह धुरंधर