kiss of marriage


देख अ ना बगीचा में.
सैया गइल बारन,
देखअ ना बगीचा में.
लाठा-लाठी भइल बा,
देखअ ना बगीचा में.
सैया गइल बारन,
देखअ ना बगीचा में.
अतना कहेनी तनी पीछे-पीछे रहीं,
आगे-आगे, उछलअ तारान,
देखअ ना बगीचा में.
सैया गइल बारन,
देखअ ना बगीचा में.
अरे दूध-पियत बच्चा,
आ हमरा के,
के देखी?
रोजे समझावेनी, रतिया, कमरा में,
दिन में फिर उनकर जोश मारताटे।
देखअ ना बगीचा में.
सैया गइल बारन,
देखअ ना बगीचा में.

परमीत सिंह धुरंधर

इबादत


मोहब्बत में रोने वाला,
इबादत में बैठा है.
देखो,
खुदा भी तनाव में आ गया है.
जाने क्या, मांग दे.
सितम की बाजियां खेलने वालों,
कभी अपनी आँखों के दहशत को पढ़ों.
जाने कौन सी बाजी,
तुम्हारी किस्मत को छल दे.
किसी का दिल तोड़ कर,
डोली चढ़ना तो आसान है.
डोली छोड़ कर कोई दिल जोड़ दे,
ऐसा भी तो कोई दिखे.

परमीत सिंह धुरंधर

चाहत


तेरी पलकों में जी लूँ,
मैं अपने सपनों की साँसे.
मेरी पलकों में तू रख दे,
अपनी साँसों के सपनें.
अँधेरी राहों में तू चले,
मेरी बाहों को थाम के.
तेरी बाहों के सहारे,
मैं काटूं जीवन के अपने अँधेरे.
तेरे ख़्वाबों को,
मैं हकीकत बना दूँ.
तू मेरे हकीकत में,
ख़्वाबों का रंग भरें.

परमीत सिंह धुरंधर

दूध पिलाती मेनका


बिन पैसे का प्रेम दिखा दे,
तो मैं भी बिक जाऊं तुझपे।
माँ जैसी सच्ची कोई महबूब दिखा दे,
तो मैं भी बिक जाऊं तुझपे।
कब तक,
नारी देवी है- इसका जय-घोष करोगी।
बस दूध पिलाती मेनका दिखला दे,
तो मैं भी बिक जाऊं तुझपे।

परमीत सिंह धुरंधर

शैवाल का प्रेम


मेरा प्रेम,
एक पश्चाताप,
बन के रह गया.
सागर की लहरों पे,
एक शैवाल,
बन के रह गया.
क्या लिखूं?
उस प्याले के लिए.
जो मेरी अधरों से,
लग कर भी,
शहंशाह के महल,
की दीवारों पे सज गया.

परमीत सिंह धुरंधर

मोह


जिंदगी से मुझे मोह तब हुआ,
जब तेरी गोद में मैं खेला, पिता .
और जिंदगी से मोह भी तब टूटा,
जब तुझे काँधे पे ले के चला.

परमीत सिंह धुरंधर

जवानी


जवानी के ढलने का इंतज़ार कर रहा हूँ,
वो उम्र देख रही हैं मेरी,
और मैं दिल से जवान हो रहा हूँ.
कल तक जो छत पे निकलती थीं,
गलियों में देखती थीं.
अब घंटो बैठती हैं आईने के पास,
और मैं उनकी गलियों में,
चक्कर लगा रहा हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

सर्द-रात


दो रात बाहों में आये,
दो पल मुस्करा के.
दो जिंदगियां तबाह कर गए,
दो सर्द-रात संग में गुजार के.

परमीत सिंह धुरंधर

चाल


जिसकी एक चाल पे दुनिया मिट गयी,
जाने कैसे हमने अपनी साँसों को संभाला है.

परमीत सिंह धुरंधर

शादी का मंडप


अब भूख लगी है,
प्यास मिटने के बाद,
की रात का इंतज़ार नहीं होता,
मंडप में तुम्हे देखने के बाद.
छोड़ो, ये सात-फेरों की रस्में,
मेरी किस्मत पे एतबार नहीं,
ए मालिक,
तुझे देखने के बाद.
बहुत दूर से आया हूँ,
तुम्हे अपना बनाने को.
अब पर्दा बर्दास्त नहीं होता,
यूँ नजरे मिलाने के बाद.

परमीत सिंह धुरंधर