मेरी पलकें अभी तक हैं भींगी-भींगी,
उनका चेहरा झुर्रियों से सवरने लगा।
वो भूल गयीं जिन पेड़ों की छावं,
उनकी शाखाओं पे फिर न कोई पुष्प खिला।
राहें – किस्मत को देखा मैंने बदल – बदल कर,
उनकी झोली में पुष्प और मुझे बस काँटा मिला।
परमीत सिंह धुरंधर
मेरी पलकें अभी तक हैं भींगी-भींगी,
उनका चेहरा झुर्रियों से सवरने लगा।
वो भूल गयीं जिन पेड़ों की छावं,
उनकी शाखाओं पे फिर न कोई पुष्प खिला।
राहें – किस्मत को देखा मैंने बदल – बदल कर,
उनकी झोली में पुष्प और मुझे बस काँटा मिला।
परमीत सिंह धुरंधर