तेरे मस्त -मस्त आँखों से,
कुछ ख्वाब चुरा लूँ क्या?
तू दे – दे इज़ाज़त तो आज,
रसोई सम्भालूँ क्या?
तेरे ओठों को पीने की,
रोज -रोज चढ़ी रहती है.
तू दे – दे इज़ाज़त तो आज,
चूल्हा जला दूँ क्या?
कंघी तेरी जुल्फों से,
जब बूंदों को छानती है.
गीली साड़ी में तू,
सुलगती गैंठी सी लगती है.
तू दे – दे इज़ाज़त तो आज,
सारे कपड़े धो डालूं क्या?
परमीत सिंह धुरंधर