दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?
मुरादों को जला दिया है,
उम्मीदों को कब का दफना दिया है.
फिर भी आँखे जो देखें खवाब,
तो कैसे संभाले, खुदा?
दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?
रास्तों, गलियों, शहर तक छोड़ के उनका,
इन घने वीरानों में बैठें हैं.
फिर भी हवाएं उड़ा लाएं दुप्पट्टा,
तो कैसे संभाले, खुदा?
दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?
होंठों की प्यास को नसीब मान लिया है,
उनकी बेवाफ़ाई को अपना जहाँ मान लिया है.
फिर भी कोई आँचल ढलका दे,
तो कैसे संभाले, खुदा?
दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?
परमीत सिंह धुरंधर