मस्ती में बहो मेरे बैलों


दुल्हन सी सजा दू धरती,
सावन सा आँचल इसका।
ऐसे मस्ती में बहो, मेरे बैलों,
की चमक उठे हर कोना इसका।
प्यासे हर कण की,
प्यास मिटा दूँ अपने पौरष से.
हर बदली, हर दरिया, फिर चाहे,
भिगोना बस आँचल इसका।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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