माँ की रोटियां


जवानी का खेल है,
किसी के इश्क़ में रोना।
बुढ़ापे के आंसू तो बस, निकलते है,
याद कर माँ की लोरियाँ।
आसान नहीं,
हाथों को जला कर सेकना रोटियां।
समजह्ते हैं ये तब,जब थाली में,
पड़ती हैं जाली-भुनी रोटियां।
जावानी का खेल है,
सितारों में चाँद का देखना,
बुढ़ापे में तो,
चाँद-तारों,सबमे दिखती हैं,
बस माँ की ही रोटियां।
यूँ उम्र गुजार दी,
जिसे पाने को.
उसे पाकर, याद आती हैं,
बस माँ की रोटियां।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

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