हमके दर्पण दिखा के बोले मोरे सवारिया,
आज रात को काटूंगा, आके ये चमचम से गलिया।
मैं शरमाई, सकुचाई, मृग सी रह गई कपकपा के,
पास आके रात में सब भूल गए सवारिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

अब का साड़ी खोलेम राजा जी?


तनी धीरे -धीरे, तनी धीरे -धीरे,
दौड़ाई ई टमटम राजा जी,
हचका मारे,
त अ दुखे कमरिया राजा जी.
ऐसे जोश में ना होश गवाईं राजा जी.

चूड़ी टूटल, केसिया खुलल,
अब का साड़ी खोलेम राजा जी?
तनी लोक-लाज,
शरम कुछु त अ बचाईं राजा जी.
तनी धीरे -धीरे, तनी धीरे -धीरे,
दौड़ाई ई टमटम राजा जी,
हचका मारे,
त अ दुखे कमरिया राजा जी.

पोरे -पोरे देहिया के तुड़ के रखनी,
कहिया समझेम,
इ शरीरिया भी ह हाड़ -माँस राजा जी?
तनी बैठे ना दीं,
फुरसत में दुगो घड़ी राजा जी.
तनी धीरे -धीरे, तनी धीरे -धीरे,
दौड़ाई ई टमटम राजा जी,
हचका मारे,
त अ दुखे कमरिया राजा जी.

जाने माई का -का समझा के भेजली,
रउरा आगे कउनो उपाय ना बाचल राजा जी.
तनी देहिया पे रहेदी साड़ी राजा जी.
तनी धीरे -धीरे, तनी धीरे -धीरे,
दौड़ाई ई टमटम राजा जी,
हचका मारे,
त अ दुखे कमरिया राजा जी.

छोड़ी अब गइल छपरा और सिवान,
अँगना में रहीं आ खाईं गरम-गरम राजा जी.
तनी हमरों के लुटे दी जवानी राजा जी.
तनी धीरे -धीरे, तनी धीरे -धीरे,
दौड़ाई ई टमटम राजा जी,
हचका मारे,
त अ दुखे कमरिया राजा जी.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं त्रिलोक बदल दूंगा


मैं अंदाज बदल दूंगा,
परिणाम बदल दूंगा।
होगा अगर कोई रण यहाँ,
तो धरती क्या?
मैं आसमान बदल दूंगा।
क्यों चिंतित हो पिता?
तात श्री के ज्ञान से.
अगर राम, नारायण भी हैं तो,
मैं अपनी तीरों से त्रिलोक बदल दूंगा।
मैं यूँ ही इंद्रजीत नहीं,
मुझे त्रिलोक के सुख की चाह नहीं।
बस आपके जय-जयकार के लिए,
पिता श्री,
मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड बदल दूंगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे वक्ष ही हुए मेरे सौतन


जब से भए तुम बालम जी परदेसिया,
प्यासी – प्यासी मैं, प्यासी रे अचरिया।
मेघ बरसे, माटी भींगें, सोंधी रे महक,
बिन तेरे बालम जी, अंग -अंग भारी और प्रबल।
जब से भए तुम बालम जी परदेसिया,
प्यासी – प्यासी मैं, प्यासी रे अचरिया।
चुहानी बैठूं, जांत चलाउन, मुसल चलाउन,
कहाँ मिटती हैं फिर भी तन – मन की थकन.
जब से भए तुम बालम जी परदेसिया,
प्यासी – प्यासी मैं, प्यासी रे अचरिया।
कलियाँ खिलीं, भ्रमर गूंजे, आयी रे सावन,
बिन तेरे बालम जी, मेरे वक्ष ही हुए मेरे सौतन।
जब से भए तुम बालम जी परदेसिया,
प्यासी – प्यासी मैं, प्यासी रे अचरिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

I want my share


Some relationships give memories,
And some gives a meaning to the life.
It is just that,
I want my share before I die.
Neither money nor success,
Nothing can make me cry.
It is just that,
I want my share before I die.

 

Parmit Singh Dhurandhar


तुम नजरे झुका कर,
यूँ ही शर्म में बंधी रहो.
मैं बस अधरों से पी लूँ ,
तुम अपनी साँसों को,
मेरे अधीन कर दो.

पिता का तिलिश्म


पिता की मौत के बाद,
मैंने घर को तितर -बितर कर दिया।
जाने क्या ढूंढ रहा था?
घर वाले परेशान,
बड़ा भाई पागल हो गया है क्या?
सबके आँखों में सवाल,
लेकिन सब खामोश।
लेकिन मेरा अंतर्मन, जानता था मेरी लालच को,
वो पहचानता था मेरे अंदर के बईमान इंसान को.
मैं वो खजाना जल्द -से -जल्द,
प्राप्त करना चाहता था.
जिसके बल में मेरे पिता ने,
शान-ओ-सौकत की जिंदगी मुझे दी थी.
जिसके बल पे मैंने पुणे विद्यापीठ और,
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में,
अमीरी के अहंकार को जिया था.
जिस पिता के खजाने को मैंने,
लड़कियों के आगे -पीछे,
उनके हुस्न पे लुटाया था.
जिद, अहंकार या राजपूती शान के सारे,
मेरे अपने गढ़े तमगे,
जो मैं शान से ढोता था.
सच्चाई है की वो मेरे ना परिश्रम का फल था,
ना मेरे पौरुष की कहानी।
मैंने सिर्फ और सिर्फ अपने पिता के मेहनत और संचय,
को अपने अहम् का ढाल बनाया था.

पसीने से लथ-पथ जब मैंने एक कोने में सर पकड़ लिया,
माँ ने आँचल से पोंछते हुए पूछा, “क्या ढूंढ रहे हो बेटा?”
मेरे कहने पे की पैसे या कोई कागज बैंक का,
माँ उठी, और एक पोटली उसकी साड़ी की बनी,
लाकर मेरे आगे रख दिया, “बस यही है बेटा।”
एक भूखे भेड़िये सा मैं उस पोटली पे टूट पड़ा,
लेकिन उसके खुलते ही मेरे अंदर तक अँधेरा छा गया.
सेवा-निविर्ती का पत्र और उनकी आखिरी तनखाह,
और इसी पे उन्होंने आठ लोगो को ऐसे पोसा,
जैसे कोहिनूर हो संदूक में.
उस दिन मैं गरीब हो गया,
उस दिन मेरा अहंकार मुझपे हंस रहा था.
एक पिता ने एक तिलिश्म बना के रखा था,
जो उस दिन ढह गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तमन्ना


तमन्ना क्या करे दिले नादान भी,
शौक है समंदर का, जमीन रेत की.
हँसते हैं सब कह के मेरी औकात ही क्या?
वो क्या समझेंगे जो [पढ़ते हैं बस शक्लो -सूरत ही.

 

परमीत सिंह धुरंधर

Ego and Logic


If you cannot,
I cannot,
Because I am not that kind of man.
If you think
You are 100% correct.
I think too,
I am a genius.
If you cannot,
I cannot,
Because I am not that kind of man.
If you think
You are 100% logical.
I think too,
I am a champion philosopher.
So, if you cannot,
I cannot,
Because I am not that kind of man.

 

Parmit Singh Dhurandhar

मेरी प्रियतमा है एक धोबन


मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
नश -नश में मेरे है बिहारीपन।
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
मैं शिष्य रहा हूँ Prof. Sitaramam का,
किया हैं उनसे ही विज्ञान का अध्यन।
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
नित प्रातः करता हूँ,
गुरु गोबिंद जी को नमन.
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
मैंने किया है लालजी सिंह के समक्ष,
भोजपुरी में गायन।
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
पहुँचा हूँ यहाँ तक, छूकर,
माता – पिता, गुरु Kasbekar के चरण.
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
मुझे लावणी है बहुत ही पसंद।
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
मेरे ह्रदय में बसते है,
लाला, करद, पवार, मराठी मानुस गन.
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
मेरी प्रियतमा है गावं की,
अनपढ़ -गवार एक धोबन।
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
मुझे भाता है उसका अल्हड़पन।
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
वो जो मुस्करा के हाँ कह दे तो,
ले जाऊं उसे बिहार, बना के दुल्हन।

परमीत सिंह धुरंधर