विजय श्री


मैं सागर की लहरों,
को बाँध के पी जाऊं।
मगर मेरी प्यास,
तेरे अधरों से बुझती है प्रिये।
मैं हिमालय के मस्तक पे, एक ही बार में,
अपने विजय का ध्वज लहराऊं।
पर विजय श्री,
तुम्हारे बाहों में मिलती है प्रिये।
मैं बादलों को रोक कर,
सावन को बरसा दूँ।
मगर भिगनें का मज़ा,
तेरी जुल्फों में है प्रिये।
मैं पुष्पों को चुम कर,
भौरां बन जाऊं।
मगर मैं झूमता तेरी वक्षों पे हूँ प्रिये।
तू ही मुझे पूर्ण करती है,
तू ही मुझे सम्पूर्ण करती है।
तुझसे मिल कर ही,
मुझे जिंदगी मिली है प्रिये।

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे साहस की सहचारिणी


तुम ह्रदय की स्वामिनी,
धमनियों की रागिनी,
नस – नस का मेरे स्पंदन हो,
तुम हो मेरे मन की कामिनी।
चक्षुओं की मेरी रौशनी,
मेरे अधरों पे प्रज्जवलित अग्नि,
मेरे साँसों की ऊष्मा हो,
तुम हो मेरे साहस की सहचारिणी।

परमीत सिंह धुरंधर

पुणे – प्रेम


पुणे के अपने वीरान खंडहरों में,
एक आलिशान महल बनाकर।
तुम्हे अपने बाहों में भरकर प्रिये,
जब मैं चुम्बन करूँगा।
तो बादल उमड़ – उमड़ कर,
और कलियाँ कम्पित हो कर,
क्षितिज तक लालिमा प्रदान करेंगे।
जब तुम्हारी भीगी – भीगी,
जुल्फों की हर गाँठ को,
मेरी साँसें अपनी ऊष्मा प्रदान करेंगी।
तो हर दिशा से हवाएँ प्रखर हो कर,
मेरु पर्वत तक,
नस – नस में कम्पन का आवाहन करेंगीं।
बस इंतज़ार करों अपने मिलन का,
मेरे प्रेम के मधुर बाणों पे पुलकित,
तुम्हारे योवन से।
उषा से रात्रि तक,
स्वयं प्रकृति भी रंज करेंगी।

परमीत सिंह धुरंधर

बस तुम मेरे साथ रहो प्रिये


बस सूरज प्रखर हो अम्बर में,
मैं हर युद्ध जीतता चला जाऊँगा।
रात चाहे जितनी लम्बी हो,
मैं रौशनी बनकर सुबहा लाऊंगा।
बस तुम मेरे साथ रहो प्रिये,
मैं हर गम को,
खुशियों का आँचल पहनाऊंगा।
मेरी भूख – प्यास सब, अब तुम्ही हो,
तुम्हारे नैनों से जीवन मेरा।
तुम यूँ हैं मुस्करा कर मिलती रहो,
मैं पतझड़ को बसंत बनाऊंगा।

परमीत सिंह धुरंधर

जहाँ राम की हो गयीं जानकी


जहाँ बुध हुए, महावीर हुए,
और दुनिया को मिली शान्ति.
वो धरती है बिहार की,
वो धरती है बिहार की.
जहाँ गंगा बहतीं, गंगा उमरती,
और राम की हो गयीं जानकी.
वो धरती है बिहार की,
वो धरती है बिहार की.
जहाँ गुरु मिले, गोबिंद मिले,
और मिल जाए सबको मुक्ति.
वो धरती है बिहार की,
वो धरती है बिहार की.
जहाँ गुप्त हुए, मौर्य हुए,
और बूढ़े कुँवर ने खडग उठा ली.
वो धरती है बिहार की,
वो धरती है बिहार की.
जहाँ दिनकर हुए, नेपाली हुए,
और बाबा नागार्जुन ने पहनी,
विद्रोह की चोली.
वो धरती है बिहार की,
वो धरती है बिहार की.

परमीत सिंह धुरंधर

माई के दुलारी पिया के आस में


धीरे – धीरे मनवा विभोर भइल बा,
हल्दी चढ़त, रंग निखर गइल बा.
गावं – गावं उमरत नदी रहली जे,
आज उनकर कोठारी में पड़ाव भइल बा.
भूख मिटल, प्यास छुटल, देखत – देखत,
बाबुल के आँगन के चिड़िया उड़ गइल बा.
एगो हल्दिया, अइसन मिलल रे,
तन पे चढ़ल, आ मन रंगल रे.
काजल फीका पड़ल, गजरा फीका पड़ल,
देखत – देखत, दर्पण भी सौतन भइल बा.
धीरे – धीरे मनवा विभोर भइल बा,
हल्दी चढ़त, रंग निखर गइल बा.
माई के दुलारी पिया के आस में,
जल अ तारी चिपरी जैसे आग में.
नाज – नखरा रखस योवन पे जे,
उनकर अपने अंग – अंग से अब बैर भइल बा.
धीरे – धीरे मनवा विभोर भइल बा,
हल्दी चढ़त, रंग निखर गइल बा.

परमीत सिंह धुरंधर

रस


मैं रौंदत्ता हूँ और मैं रौंदूँगा,
मुझे जीत – हार का भय नहीं।
युद्ध किया है और करता रहूँगा,
मुझे विध्वंश का डर नहीं।
मैं नदिया नहीं जो राहे मोड़ लूँ,
न सागर हूँ, जो किनारों से बांध जाऊं।
रस पीया है, रस पियूँगा,
मैं भौरां हूँ,
मुझे कैद से भय नहीं।
बादलो का काम हैं सींचना,
काटें खिलें या फूल,
उससे उनको प्रेम नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

बिहार इतना विकसित हो


बिहार इतना विकसित हो,
दूर-दूर तक यूँ ही पुष्प पुलकित हों.
यूँ ही भ्रमरों का गुंजन हो,
यूँ ही फूलों से रसपान हो.
यूँ ही माँ के आँचल में,
लालों का चतुर्मुखी समृद्धि हो.
उंच-नीच भुला के,
इस वृक्ष की हर शाखा का,
हर दिशा में वृद्धि हो.

परमीत सिंह धुरंधर

सौतनें


कहीं दुपट्टा लपेटते – लपेटते,
वो परायी हो गयीं.
कहीं कंचे खेलते – खेलते,
हम जवान हो गए.
वो जब तक लौटीं,
अपने दो बच्चों के संग.
हम भी किसी के,
शौहर हो गए.
कभी काजल की डिबिया,
दिया था जो स्कूल में,
उनकी आँखों का रंग देख कर.
आज उसी को लगाती हैं,
मेरी बेगम की आँखों में,
उनकी दिलो-जान बन कर.
की बांटती है हर,
सुख-दुःख, दर्द की बातें.
बस वो ही एक राज,
अपने सीने में रख कर.
कौन कहता है की,
सौतनें, बहने नहीं होतीं.
बस रात के सफर में,
कभी साथ नहीं होतीं.

परमीत सिंह धुरंधर

हिन्दुस्तान


हिन्दुस्तान के धरती पे,
हैं फैसलें दिलों के.
कहीं माँ है गाती लोरी,
कहीं बहन खड़ी है राखी लेके.
कहीं पिता को इंतज़ार है,
पुत्र के लौटने का.
कहीं रखती हैं जला के दिया,
कोई आज भी उनकी यादों का.
कहीं दुपट्टा लपेटते -लपेटते,
वो परायीं हो गयीं.
कही पतंगों के पेंच पे,
वो मेहँदी लूटा गयीं.
कहीं बैलों संग बहते हैं,
अपना सब कुछ भुला के.
कहीं फसलों के संग ही,
काट जाती हैं जवानी की रातें.
कहीं मोहल्ले – मोहल्ले,
हम पीछे – पीछे भागे।
कहीं बुर्के के अंदर से भी,
दिखतीं है वो मुस्कराते।
हिन्दुस्तान के धरती पे,
हैं फैसलें दिलों के.
डोली तो सैकड़ों उठाई,
पर हर बार,
भीगीं है कहार की आँखे.

परमीत सिंह धुरंधर