जूनून


कुछ तो किस्मतों का साया है,
मोहब्बत में जिंदगी बस, जाया है.
सरहदों पे मिटने वालों की,
कब हुईं हैं ये जागीरें,
इश्क़ में रह जाती हैं,
बिना छत के ही घर की दीवारें.
फिर भी ये जूनून है,
हमारे जिस्म का,
साँसों के रुकने तक,
लगी रहती हैं हमारी उम्मीदें.

परमीत सिंह धुरंधर

गुनाहों के साये


कई रिश्ते मेरे,
आज भी गुनाहों के साये में हैं.
और कई रिश्तों के लिए मैं,
आज भी गुनाहें कर जाऊँगा.
वो मेरी न बन सकी,
ये किस्मत नहीं,
उनकी मर्जी है,
वो अगर आज मुस्करा दें,
तो उनको अपना बनाने के लिए
आज भी क़यामत मचा जाऊंगा.

परमीत सिंह धुरंधर

लाखों में है एक मेरी माँ


mom

पहाड़ों पे चढ़ के देखा,
सितारों में बढ़ के देखा,
दिखती है बस माँ, हर मंदिर में,
जब भी सजदा कर के देखा।
भूखे पेट चल के देखा,
बैलों संग खेत में बह के देखा,
चूल्हे पे बैठी दिखी माँ,
जब – जब सुनी थाली देखा।
जख्मों को दुखते देखा,
हर रिश्ते को टूटते देखा,
रात भर सिराहने बैठी मिली माँ,
जब भी तन, टॉप में तपते देखा।
कैसे तोड़ दूँ ये रिस्ता,
जवानी की मस्ती में,
जिसके आँचल में पल कर,
मैंने हर सपना देखा।
सारी दुनिया घूम के देखा,
लाखों में है एक मेरी माँ.

परमीत सिंह धुरंधर

There is nothing which has more value than mom…..

मैराडोना मैं, मेडोना तू


रूप-रंग में सोना तू,
अंग-अंग से टोना तू,
आज तो घूँघट खोल दे रानी,
मैराडोना मैं, मेडोना तू.
मैराडोना मैं, मेडोना तू.
मैराडोना मैं, मेडोना तू.
आज की रात लम्बी है,
तन-मन पे छाई मस्ती है.
बस अपने ओठों से पिला दे तू,
क्रिस्टिनो मैं, बिपाशा तू.
क्रिस्टिनो मैं, बिपाशा तू.
क्रिस्टिनो मैं, बिपाशा तू.

परमीत सिंह धुरंधर

This is dedicated to my favorite player Meradona and his love for the game.

मधुर नहीं है प्रेम कोई


मधुर नहीं है प्रेम कोई,
न मधुर ही है कोई ख़्वाब हाँ.
कहीं डूब रहा है सूरज रोज,
कहीं घट रहा है रूप चाँद का.
कहीं पुष्प को इंतज़ार है,
किसी भ्रमर के चुम्बन का.
कहीं भ्रमर भी है कैद में,
हो आसक्त इस पराग का.
जलने को अब क्या रखा है,
महबूब तेरी यादों के सिवा.
तेरे योवन पे टूटे दर्पण कई,
मेरे योवन को न मिला कोई तुझ सा.

परमीत सिंह धुरंधर

Love is not sweet…Crassa

नारी सम्मान या एक ढोंग


रामायण, महाभारत और भारतीय घरों में कलह और बटवारे का दोष सदा से भारतीय नारियों के माथे मढ़ा गया है. लेकिन, आज तक किसी ने भी देश के बटवारे का दोषी ढूढ़ने का प्रयास नहीं किया, क्यों की इसके जिम्मेवार हमारे पुरुष भाइयों की सत्ता की भूख और उनकी सोच थी. नारी सम्मान की चिंता करने और उसके लिए चिल्लाने वालो ने कभी इस तरफ धयान नहीं दिया।

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


धीरे – धीरे कहता हूँ मैं अपने आँखों के समंदर से,
अगर बहना ही है तो मेरी माँ के चरणों को धो दे.

परमीत सिंह धुरंधर

नैहर के चोर


गली – गली में शोर बालम जी,
धरती पे एगो चोर बा.
लूट अ ता रोज हमर खजाना,
अइसन उ मुँहजोर बा.
हमरा रहते ये रानी,
केकर तहरा पे जोर बा.
हमरा त लॉग अ ता,
की तहरे मन में कउनौ चोर बा.
चल जा तानी रोजे बथानी,
हमरा के अकेले छोड़ के.
आव अ ता आधी रात के,
दे ता देहिया झकझोड़ हाँ.
गली – गली में शोर बालम जी,
धरती पे एगो चोर बा.
लूट अ ता रोज हमर खजाना,
अइसन उ मुँहजोर बा.
काहे ना चिल्लाइलु तू,
आवाज देहलू बढ़ के.
हमरा त लॉग अ ता रानी,
तहरा भाइल ई चोर बा.
मुँहवा दबले रहल हमार,
अंगिया पे रखले रहल धार हाँ.
चूड़ी तुरलख, कंगन छिनलख,
ले गइल नथुनिया तोड़ हाँ.
गली – गली में शोर बालम जी,
धरती पे एगो चोर बा.
लूट अ ता रोज हमर खजाना,
अइसन उ मुँहजोर बा.
हमरा त लॉग अ ता रानी,
तहरा नैहर के कउनौ जोड़ हाँ.
गली – गली में शोर बालम जी,
धरती पे एगो चोर बा.
लूट अ ता रोज हमर खजाना,
अइसन उ मुँहजोर बा.
हमरा रहते ये रानी,
केकर तहरा पे जोर बा.
हमरा त लॉग अ ता,
की तहरे मन में कउनौ चोर बा.

परमीत सिंह धुरंधर

अजबदेह – जोधाबाई


एक जोधा के प्रेम के,
हज़ार किस्से कहने वालों.
कभी अजबदेह के त्याग की,
एक कहानी तो गढ़ के देखो.
क्षत्राणी थी, अभिमानी थी,
अपने पति की प्राण-प्यारी थी.
जोधा ने जिसका त्याग किया,
चंद सोने – चाँदी की चाहत में.
अजबदेह ने शान राखी,
पुरखों के उस निशानी की.

परमीत सिंह धुरंधर

सौ बार लडुंगा हल्दीघाटी


सौ बार लडुंगा हल्दीघाटी,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।
जब तक चेतक का साथ रहेगा,
मुगलों से भिड़ता रहूँगा मैं।
गम नहीं मुझे अभावों का,
चाहे वन – वन, मैं फिरता रहूँ।
मिटाता रहूँगा मुगलों को,
जब तक निशाँ है धरती पे।
जो झुक गए राजपूत,
उनमे अपने पिता का खून नहीं।
जो टूट गए राजपूत,
उनको अपने खून पे यकीं नहीं।
लहराता रहेगा केसरिया,
जब तक राणा खड़ा मेवाड़ में।
सौ बार लडुंगा हल्दीघाटी,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।
जब तक चेतक का साथ रहेगा,
मुगलों से भिड़ता रहूँगा मैं।

परमीत सिंह धुरंधर