ऐसी रात हो


ग़मों की ऐसी रात हो,
तुम्हारी जुल्फें,
मेरे सीने पे बिखरीं हों.
मेरी आँखों से बरसते आंसूं,
तुम्हारी गालों पे थिरकती हों.
थका, निराश मन, हार कर,
तुम्हारी आगोस में पनाह ले.
और एक नयी सुबह के जोश में,
उठे, बढे, संग तुम्हारे,
एक नईं मंजिल की और.
अंततः,
तुम्हारे अंगों पे,
मेरे जंगे-जीत की निशानी हों.
ग़मों की ऐसी रात हो,
तुम्हारी जुल्फें,
मेरे सीने पे बिखरीं हों.

परमीत सिंह धुरंधर

कर्क राशि की वो लड़की


नसीब, दो ही हैं.
आवो, उन्हें बदल लें.
फिर भी, तुम्हे डर है.
तो ये वादा है,
दर्द तुम्हारें, मेरे।
और खुशियाँ मेरी,
सब तुम्हारी।
XXXXXXXXXX
आज फिर,
किसी से मोहब्बत हो गयी.
हाथों से दूर, आँखों से दूर,
ओठों से दूर, किस्मत से भी दूर,
मगर, फिर भीं उनकी चाह हो गयी.
कर्क राशि की वो लड़की,
इतनी ख़ास लगी.
मार्च में ही सेप्तेम्बर,
कर गयी.
आज फिर,
किसी से मोहब्बत हो गयी.
XXXXXXXXXX
यूँ तो निगाहें शरारत करेंगी,
मगर तुम मिलो तो पर्दा करेंगी।
जवाँ हसरते हैं, दबाऊं मैं कैसे,
वरना फिर मुझसे ही झगड़ा करेंगी।
लहराती हैं आँचल तुम्हारे लिए,
तुम्हारे लिए ही आँखें सवरतीं।
हर एक दरवाजे पे लगी हैं ये,
मगर तुम्हारे ही आहट से डरतीं।
यूँ तो साँसें पिघलती हैं रात दिन,
मगर तुम मिलो तो दुप्पट्टा करेंगी।
जवाँ हसरते हैं, दबाऊं मैं कैसे,
वरना फिर मुझसे ही झगड़ा करेंगी।

परमीत सिंह धुरंधर

नकाब


तड़प रहा हूँ सीने पे जख्म को लिए,
कहीं तो मिल ए दिलवर, नकाब को गिरा के.

परमीत सिंह धुरंधर

किस्मत


मेरी पलकें अभी तक हैं भींगी-भींगी,
उनका चेहरा झुर्रियों से सवरने लगा।
वो भूल गयीं जिन पेड़ों की छावं,
उनकी शाखाओं पे फिर न कोई पुष्प खिला।
राहें – किस्मत को देखा मैंने बदल – बदल कर,
उनकी झोली में पुष्प और मुझे बस काँटा मिला।

परमीत सिंह धुरंधर

पाप और पुण्य


पाप दो तरह से करते हैं. एक जवानी में पाप करके बुढ़ापे में सुधार कर लेते है. ये लोग उच्च कोटि के होते हैं, जैसे वाल्मीकि, रावण, दुर्योधन, अंगुलिमाल डाकू, नरेंद्र मोदी और अरविन्द केजरीवाल। दूसरा तरीका होता है पूरी जिंदगी अच्छे रह के बाद में, बुढ़ापे में फंस जाते हैं इस रोग में और मज़ा भी आता है अपने पुण्यों को क्षीण-क्षीण होते देख के. जिद रहती है की हमारे हैं, लूटने दो. मिथ्या पाल लेते हैं की हम ही सर्वश्रेष्ठ। ऐसे लोग ऊचाई से गिरते – गिरते, पतन की उस पेंदी तक जाते हैं जहाँ से कोई पुण्य करने पे भी पुण्य नहीं मिलता। इसे दाग लगा देना कहते हैं. इसलिए पहले के लोग इस तरह का काम होने के बाद आत्मगलानी में या तो घर- संसार छोड़ देते थे या आत्महत्या करते थे या आत्मशुद्धि के लिए प्रयाग जाते थे. ऐसे लोगो की श्रेणी में भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, अश्वथामा, देवगौड़ा, वी. पी सिंह और नितीश कुमार आते हैं.
आज सारे बुद्धिजीवी लोग दूसरी श्रेणी की महिमा करें में लगे है. पहले के समय में लोग प्रथम श्रेणी के लोगो की महिमा ज्यदा करते थे. हाँ, एक बात कहना भूल गया की एक तीसरी श्रेणी होती है जिसमे सिर्फ एक ही व्यक्ति हुआ, विश्वामित्र, जिसने पाप, पुण्य, फिर पाप करने के बाद फिर पुण्य अर्जित किया.

परमीत सिंह धुरंधर

एक लड़की


20 से 25 तक,
लिव -इन -रिलेशनशिप की मौज़ देखी,
30 के बाद,
शादी को तरसती आँखे देखीं।
प्यार में सबका,
दिल तोड़ती एक लड़की देखी,
और चोट खाने के बाद,
उसको माय चॉइस गाते देखा।

परमीत सिंह धुरंधर

जवानी


शेरो की बस्ती देखी,
बस्ती में शेर देखा।
रिश्तों की कश्ती देखी,
कश्ती में रिश्ता देखा।
दूध के लिए बिलखते बच्चें देखें,
बच्चों के लिए तरसते,
बून्द-बून्द, छलकते दूध देखा।
फटे-चीथड़े आँचल में जवानी देखी,
जवानी में फटा – चिथड़ा आँचल देखा।
२० से २५ तक,
लिव -इन -रिलेशनशिप देखी,
३० के बाद,
शादी को तरसती आँखे देखीं।
प्यार में सबका,
दिल तोड़ती एक लड़की देखी,
और चोट खाने के बाद,
उसको माय चॉइस गाते देखा।

परमीत सिंह धुरंधर

मैं तब भी लड़ूंगा


जहाँ जवानी का एहसास न हो,
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
आहे भरने की न फुर्सत हो,
ना शिकायत के शब्द गढ़ने की.
जहाँ जिस्म को सावन का,
मन को प्रियतमा का एहसास न हो.
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
पग थक गए हो, पर पथ ख़त्म न हो.
आँखे मूंद रही हो, पर मंजिल न हो.
तन से रिस्ते खून को भी बहने से,
रोकने का जब समय न हो.
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
ह्रदय में हुंकार तो उठे, पर
आँखों से बहे भी ना बन के धारा।
जब अपनी ही साँसे बोझ लगे,
और कोई न हो सहारा।
जब मेरे बस में ही मेरा वक्त न हो.
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
मैं तब भी आगे बढूंगा,
मैं तब भी चलूँगा।
मैं तब भी लड़ूंगा,
ऐसी कोई ललकार तो हो.
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
जहाँ जवानी का एहसास न हो,
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.

परमीत सिंह धुरंधर

अंतर


औरत कितना भी शोर मचा ले,
कोई नहीं सुनता.
लेकिन, जब माँ को गुस्सा आता है तो,
कैसा भी बाप हो वो शांत हो जाता है.

परमीत सिंह धुरंधर

किस्मत


मुझसे मत पूछ मेरी किस्मत साथी,
हवा भी सर्द हो जाती है मेरे घर में आके.

परमीत सिंह धुरंधर