दुश्मनी


उनसे दुश्मनी, मोहब्बत में,
जैसे दुरी सितारों की, चाँद से.
दूर से देखने में,
वो मेरे करीब बैठी हैं.
मगर करीब रह के भी, रखती हैं,
चाँद फासला अपनी साँसों में.

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


नदियां उछलती हैं तो किनारे डूब जाते हैं,
हुस्न सवरता हैं, तो दर्पण टूट जाते हैं.
मोहब्बत बाहों का बाहों से मिलान नहीं है यार,
ये तो वो रिश्ता हैं,
जहाँ बिना जाम के ही लैब भींग जाते हैं.
और हलक सूखे-सूखे, प्यासे रहते हैं,
हम जीते हैं उनके इंतज़ार में,
जो अपनी हर राह को जुदा किये बैठते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

kiss of marriage


देख अ ना बगीचा में.
सैया गइल बारन,
देखअ ना बगीचा में.
लाठा-लाठी भइल बा,
देखअ ना बगीचा में.
सैया गइल बारन,
देखअ ना बगीचा में.
अतना कहेनी तनी पीछे-पीछे रहीं,
आगे-आगे, उछलअ तारान,
देखअ ना बगीचा में.
सैया गइल बारन,
देखअ ना बगीचा में.
अरे दूध-पियत बच्चा,
आ हमरा के,
के देखी?
रोजे समझावेनी, रतिया, कमरा में,
दिन में फिर उनकर जोश मारताटे।
देखअ ना बगीचा में.
सैया गइल बारन,
देखअ ना बगीचा में.

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


माँ,
ईस्वर का रूप है.
माँ,
सर्द मौसम में घूप है.
माँ है,
तो मीठी है भूख.
माँ,
मिठाई का संदूक है.

परमीत सिंह धुरंधर

इबादत


मोहब्बत में रोने वाला,
इबादत में बैठा है.
देखो,
खुदा भी तनाव में आ गया है.
जाने क्या, मांग दे.
सितम की बाजियां खेलने वालों,
कभी अपनी आँखों के दहशत को पढ़ों.
जाने कौन सी बाजी,
तुम्हारी किस्मत को छल दे.
किसी का दिल तोड़ कर,
डोली चढ़ना तो आसान है.
डोली छोड़ कर कोई दिल जोड़ दे,
ऐसा भी तो कोई दिखे.

परमीत सिंह धुरंधर

चाहत


तेरी पलकों में जी लूँ,
मैं अपने सपनों की साँसे.
मेरी पलकों में तू रख दे,
अपनी साँसों के सपनें.
अँधेरी राहों में तू चले,
मेरी बाहों को थाम के.
तेरी बाहों के सहारे,
मैं काटूं जीवन के अपने अँधेरे.
तेरे ख़्वाबों को,
मैं हकीकत बना दूँ.
तू मेरे हकीकत में,
ख़्वाबों का रंग भरें.

परमीत सिंह धुरंधर

पिता


बड़े पिता की संतान होने का ये फायदा है की माँ का प्यार दोगुना हो जाता है.
खाने को मिले या न मिले, पहनने को मिले या न मिले, मगर पिता भी माँ बनके प्यार लुटाने लगता हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

दूध पिलाती मेनका


बिन पैसे का प्रेम दिखा दे,
तो मैं भी बिक जाऊं तुझपे।
माँ जैसी सच्ची कोई महबूब दिखा दे,
तो मैं भी बिक जाऊं तुझपे।
कब तक,
नारी देवी है- इसका जय-घोष करोगी।
बस दूध पिलाती मेनका दिखला दे,
तो मैं भी बिक जाऊं तुझपे।

परमीत सिंह धुरंधर

शैवाल का प्रेम


मेरा प्रेम,
एक पश्चाताप,
बन के रह गया.
सागर की लहरों पे,
एक शैवाल,
बन के रह गया.
क्या लिखूं?
उस प्याले के लिए.
जो मेरी अधरों से,
लग कर भी,
शहंशाह के महल,
की दीवारों पे सज गया.

परमीत सिंह धुरंधर

पश्चाताप


राजपूत हो के भी,
मैंने कौन सा युद्ध लड़ा?
इतिहास के पन्नो पे,
मैने क्या है लिखा?
एक महान पिता की,
संतान हो के भी,
मैं नारी के तन से,
खेलता रहा.
एक चक्रवर्ती का पौत्र,
हो कर भी,
मैं यूँ ही जुल्फों से,
बंधा रहा.
उनकी अधरों की लाली,
और देह का चुम्बन,
के पीछे मैं,
भागता रहा.
धिक्कार है मुझे,
मेरे जीवन पे.
मैं उनकी घुंघरुओं पे,
कीड़ों सा मचलता रहा.
अब सजे कुरुक्षेत्र,
मेरे ईश्वर.
रौंद दूंगा।
तीरों से वेंधा जाऊं,
या तलवार से कटा जाऊं,
लेकिन धरती से आकाश तक,
मैं भी भीषण प्रहार करूँगा.

परमीत सिंह धुरंधर