रहनुमाओं की भीड़ थी और मैं लूट गया,
ये ही तो उनकी अदा थी हर शख्श मुख मोड़ गया.
जरा सी नाकामयाबी रिश्ते समझा देती है,
कीमत कम हुई मेरी बाज़ार में और वो सौदा बदल गया.
परमीत सिंह धुरंधर
रहनुमाओं की भीड़ थी और मैं लूट गया,
ये ही तो उनकी अदा थी हर शख्श मुख मोड़ गया.
जरा सी नाकामयाबी रिश्ते समझा देती है,
कीमत कम हुई मेरी बाज़ार में और वो सौदा बदल गया.
परमीत सिंह धुरंधर
दीवानों की बस्ती अब कहाँ मिलती है,
अब तो सितारों का चमन है.
तुम जिसे मोहब्बत बता के इतरा रहे हो इतना,
जरा गौर से देखो उसमे कितने पैबंद हैं.
आँखों में काजल लगा के दिल चुरा ले मेरे,
ऐसा चेहरा आज तक ढूंढ रहा हूँ.
जो भी मिलते हैं इन राहों में,
उनके तो गालों, हाथों,
हर अंग पे लगा कुछ- न- कुछ है.
मैं कितना भी कहूँ अपनी सच्चाई,
उनकी अदा के सामने तो सब जूठ है.
परमीत सिंह धुरंधर
बचपन के शौक जवानी को दुःख देते हैं,
और जवानी की मौज़ बुढ़ापे को रुला देती है.
कोई क्या सितम ढायेगा मुझपे,
जिसकी औलाद ही उसे गैर बता देती है.
मोहब्बत का शौक लेकर चला था,
हाथों में गुलाब लेकर चला था.
अंदाजा नहीं था जमाने के नए रूप का,
जहाँ फ्रेंडशिप ही अब सबकुछ बिकवा देती है.
क्या किस्सा सुनोगे दोस्तों, उनकी डोली उठने के बाद,
अब तो जवानी भी बुढ़ापे का एहसास देती है.
इतना तरसने के बाद भोजन का क्या,
ऐसा खाना अब भूख और बढ़ा देती है.
मुझसे मिलने आते हो तो मेरा पता मत पूछ,
मेरे नाकामयाबी, घर आने वाली हर राह में दिए जल देती है.
परमीत सिंह धुरंधर
हमर सैयां बारन बड़ा निराला,
जतना खालन मीठा ओतने तीखा।
परमीत सिंह धुरंधर
सुबह होते कहलन सैयां,
अंखिया में काजल लगावेला।
रतिया में सैयां खुदे,
सारा काजल चुरा लेहलन।
का कहीं सखी,
आपन सैयां के हाल,
दिनवा में पहनाके सब सोना-चाँदी,
रतिया में देहिया से झार लेहलन।
परमीत सिंह धुरंधर
रतिया तहरे से हाथ लड़ा के,
चूड़ी-कंगन, हँसुली हेरइली।
अइसन जीत के का करीं,
जब अकेले हम हीं आपन थाती लुटाइली।
परमीत सिंह धुरंधर
बहुत लिखूंगा ए कलम तुझे अपना बनाकर,
किसी सितमगर-जालिम से अपना दिल लगाकर।
परमीत सिंह धुरंधर
सैयां तहरे जवानी के किस्सा रहल,
जो कचहरी में चलल रहल.
पंच-प्रमुख भी का करियन तहरा के,
उनकरो घरे त ताहर काँटा फसल रहल.
बड़ा कइलअ तू मनमानी राजा जी,
गाउँवा में सबके बनइलअ तू नानी राजा जी.
छोड़अ अब ई सब धंधा हमरो पर धयान द राजा जी,
अब संभालअ तू आपन घर और दुआर राजा जी.
परमीत सिंह धुरंधर
इतना मत सोच दिल मोहब्बत की नाकामियों पे,
जिंदगी में तुझे और भी बोझ उठाना बाकी है.
कब तक झुकाएगा खुद को खिदमत में किसी की,
अभी इबादत में में सर को झुकाना बाकी है.
और कितना भागेगा अपनी प्यास मिटने के लिए,
अभी तेरा इस जिंदगी में दरिया तो बनना बाकी है.
परमीत सिंह धुरंधर
चंद पलकों की शिकायत,
की हम में कुछ नहीं है,
उनके होठों से मेरे कानो तक,
आते-आते ज़माने गुजर गए.
परमीत सिंह धुरंधर