भिगों के धरा को आंसुओं से,
कब मोहब्बत मिला है किसे।
सींच दो किसी बंजर को इतना,
की कहीं तो कोई फसल उगे.
भाग कर उसके पीछे,
कौन पा सका है उसको।
हल ही चला दो किसी बंजर पे इतना,
की कहीं तो धरती से भूख मिटे।
परमीत सिंह धुरंधर
भिगों के धरा को आंसुओं से,
कब मोहब्बत मिला है किसे।
सींच दो किसी बंजर को इतना,
की कहीं तो कोई फसल उगे.
भाग कर उसके पीछे,
कौन पा सका है उसको।
हल ही चला दो किसी बंजर पे इतना,
की कहीं तो धरती से भूख मिटे।
परमीत सिंह धुरंधर
अपनी माँ की दुवाओं का, मैं एक हिसाब हूँ,
तेरी गुलशन में मालिक, मैं आज भी आज़ाद हूँ.
सितमगर ने तो ढाए वैसे कई सितम हम पर,
पर हौसले से सीने में, मैं आज भी बुलंद हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
खिदमत माता – पिता की,
कभी बेकार नहीं जाती।
किस्मत यार की कभी,
किसी के काम नहीं आती।
गुलशन में लाखों फूल खिले हैं,
पर भौरों के प्यास नहीं जाती।
हज़ारो तारे हैं आसमान पे,
एक चाँद के बिना,
अमावस्या की अन्धकार नहीं जाती।
और क्या लिखूं उनकी बेवफाई पे,
कम्बखत,
मेरी साँसों से उनकी महक नहीं जाती।
परमीत सिंह धुरंधर
मैंने खुदा से पूछा,
की कब तक रखोगे,
इस जालिम जमाने में मुझे.
तो खुदा बोलें,
की अभी ज़माने में,
तेरी चाहत बहुत है.
परमीत सिंह धुरंधर
सितमगर की निगाहों से मत देख,
मोहब्बत को खुदा ने बनाया है,
हम जाबांजों के लिए.
जाने क्यों करते हैं लोग,
हुस्न के आगोस की तमन्ना.
मोहब्बत को खुदा ने बनाया है,
बस इबादत के लिए.
परमीत सिंह धुरंधर
तारीखे-मिलन पे चर्चा करनी हो अगर,
तो महफ़िल में मेरा कोई काम नहीं.
जश्ने-कुर्बानी मनानी हो अगर,
तो मेरा बांकपन अभी बाकी है.
होठों को पीने की तमन्ना अब कहाँ,
रक्त का कतरा बहना हो अगर,
तो मेरी जवानी अभी बाकी है.
मत पूछो की जोशे-उद्गम कौन है मेरा,
अभी इस सागर में,
कितनी नदियों का मिलना बाकी है.
परमीत सिंह धुरंधर
धुआंधार लड़ाई होगी,
सरे-आम लड़ाई होगी.
दिन हो या हो रात,
अब खुले-आम लड़ाई होगी.
तीरों से, भालों से,
बरछी और कटारों से.
ईंट से, पत्थर से,
सबसे पिटाई होगी.
धुआंधार लड़ाई होगी,
सरे-आम लड़ाई होगी.
खेत में, खलिहानों में,
बथानों में, मैदानों में.
पहाड़ो पे, दीवारों पे,
खुले-आम चढ़ाई होगी.
धुआंधार लड़ाई होगी,
सरे-आम लड़ाई होगी.
बच्चे हों या हों बूढें,
या हो नर और नारी.
रंक हो या राजा,
या हो शूद्र, या भिखारी.
मातृभूमि पे बलिदान की,
अब की सबकी बारी होगी.
धुआंधार लड़ाई होगी,
सरे-आम लड़ाई होगी.
परमीत सिंह धुरंधर
तेरी पलकों से इतना बिसरे हैं,
अब घुल रहे मेरे भी मिसरे हैं.
अर्ज करें से पहले कुछ भी,
तेरी इज़ाज़त चाहिए.
अब मेरी जिंदगी के बचे,
कुछ ही लम्हें हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
उनकी बेवफाई का गम तो बहुत है,
पर जिंदगी में दर्द भी तो बहुत है.
रोज सोचता हूँ,
आज सारे दुश्मनों को मिटा दूँ,
पर कमबख्त,
इस दिल में मोहब्बत भी तो बहुत है.
कैसे रखूं तलवार उनके गर्दन पे,
उनकी आँखों में आंसू भी तो बहुत है.
परमीत सिंह धुरंधर
समर में समर ने,
दिखाया ऐसा होसला.
समर ही नहीं बचा कोई,
अब समर के लिए.
एक हम ही हैं,
उलझे हुए हैं अब भी समर में.
जाने कितने समर बचे हैं और,
मेरे इस जिन्दगी के समर में.
परमीत सिंह धुरंधर