हसरते जिन्दगी


कभी जाम बन कर ओठों का, कभी ख्वाब बनकर आँखों का,

हसरते जिन्दगी ने हर पल में छला है,
जब घूँघट उठाया उनका अपनी चार दिवारी  में, परमित
रंगे-हुस्न ने हकीकत दिखलाया है,

नयी दुनिया..


ना मंदिरों में घंटी बजाऊंगा, ना मस्जिदों में सर ही झुकाउंगा,

तेरे दुआ से खड़ा हूँ माँ, तेरे चरणों में ही दुनिया बसाऊंगा.
नन्हे कदमो से जब चला था, तेरी ऊँगली पकरकर पिता,
तुमने गोद में उठ के आसमा दिखाया था,
गीता कभी ना मै पढूंगा, ना आयत ही कुरान के दोहराऊंगा,
प्यार पाया है, प्यार की दुनिया बनाऊंगा,
जो करते है भेदभाव इस धरती पे,
वो क्या समझेंगे इस मिटटी के रंग को,
स्वर्ग छोड़ के उतरती है गंगा,
इसी मिटटी में मिल जाने को,
ना सितारों की चमक में खोऊंगा, ना महफ़िल में बुझ पाऊंगा,
इस मिटटी का लाल हूँ, इसी में मिल जाऊँगा.
जो दावा करते है मुझे समझने का,
उन्हें नहीं पता की मै ,
उनकी समझ से परे एक अनंत हूँ,
कभी परमित, कभी सोनामित,
कही सिंह तो कभी Crassa कहलाऊंगा….

Hello world!


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