अंग-अंग पे अत्याचार


अंग-अंग पे हसीना तेरे अत्याचार कर दूंगा
एक रात तुझे ऐसे बेक़रार कर दूंगा।

तू तड़प – तड़प के गिरेगी मेरी बाहों में
तेरे अंग-अंग को ऐसे आज़ाद कर दूंगा।

तेरा जोबन पिघल उठेगा मोम सा मेरी साँसों से
मैं तीली बनकर तुझमे ऐसी आग लगा दूंगा।

परमीत सिंह धुरंधर

अदा


अदा
अदा न होती
अगर औरत बेवफा न होती।

मुझसे पूछने वालों
अगर उनका दिल इतना मासूम होता
तो शौहर से उनकी उम्र आधी न होती।

जिस्म पे जो अपने रख लेती हैं दुप्पटा
घर से निकलते ही
शहर में सिर्फ दौलतवालों की वो साथी न होती।

नजर झुका कर, ओठों को सिलकर
जो बनती है बेबस और लाचार
उनके आशिकों की इतनी मजारें न होती।

परमीत सिंह धुरंधर

सघन वन


तेरे नयन है मेरे सघन वन
जिसमे विचरण करता है मेरा मन.
तू ना जाने क्या ढूंढती है जग में?
जब तुम्हारे लिए ही है मेरा उपवन।

काले – काले मेघों को
बाँध के अपनी जुल्फों में
फिर भी प्यासी -प्यासी हो
जाने किसकी चितवन में?

परमीत सिंह धुरंधर

#मधुशाला


अतः हे रही
राह का चुनाव कर
मंजिलो का क्या है?
वो तो हैं ही वेबफ़ा।

कठिन है जीवन साकी के बिना
सरल भी नहीं, अगर साकी बन जाए मधुशाला।

परमीत सिंह धुरंधर

छपरा के पोठिया


ए जोगी तनी हमरो से रचाई ना व्याह
अंग-अंग खिल के जोहे राउर राह.

छोड़ दी हिमालय के तराई में तरपाल
बिछा के खटिया आईं
रउरा के खिलाई ताजा – ताजा पकवान।

अभी संजोग बा, अभी उम्र बा
ढल जाए जवानी तो रहें पच्छ्तात
फेन ना आई इ छपरा के पोठिया रउरा हाथ.

रोजे पठावत बारन बायना छपरा के धुरंधर Crassa
को छोड़ के जोगी तहरा के,
चढ़ जाइ हम डोली अब Crassa के साथ.

परमीत सिंह धुरंधर

#मधुशाला


कठिन है जीवन मधु के बिना
सरल भी नहीं, अगर मिल जाए मधुशाला।

Dedicated to Shir Harivansh Rai Bachchan.

परमीत सिंह धुरंधर


अभी तो तुम दुल्हन सी मासूम हो
कल से बन जाओगी प्रचंड – भयंकर।

अभी तुम्हारी निगाहें शर्म से झुकीं हैं
कल से उगलेंगी ये ज्वालायें निरंतर।

किसने लिखा है जाने क्या सोचकर तुम्हे अबला?
शरण में तुम्हारे स्यवं है महादेव – महेश्वर।

माया के आगे तुम्हारे भला कौन इस जगत में?
तुमसे बड़ा ना कोई हुआ ब्रह्माण्ड में धुरंधर।

बेवफाई के दर्द से भक्ति के आनंद तक


नुसरत फ़तेह अली खान साहेब ने बेवफाई के दर्द को भक्ति के आनंद में बदल दिया है. टूटे दिल को भी जब दर्द में झूम उठने का संगीत मिले तो वही भक्ति है.

परमीत सिंह धुरंधर

इस चांदनी रात में


जानता हूँ तुम्हारा हर इरादा सनम
इस चांदनी रात में, किससे वादा किया है
और किससे आज मिलने जाओगे?

Dedicated to Nusrat Fateh Ali Khan

परमीत सिंह धुरंधर

घूँघट


चाँद बनो तुम तो रात का फिर नशा भी हो जाए
ख्वाब बनो तुम तो धड़कनों को मुकाम मिल जाए.

कब तक रखोगे यूँ हमसे घूँघट मुख पे रानी
ये घूँघट हेट तो अधरों का मिलन भी हो जाय.

परमीत सिंह धुरंधर