जीत-हार तो श्रीकृष्ण के हाथ है
फिर कर्म को किस्मत से क्यों बांधा जाए?
तू भी है राणा का बंसज
फेंक जहाँ तक भाला जाए.
Last two lines (तू भी है राणा का बंसज. फेंक जहाँ तक भाला जाए. ) were written by Dr. Kumar Vishwas.
परमीत सिंह धुरंधर
जीत-हार तो श्रीकृष्ण के हाथ है
फिर कर्म को किस्मत से क्यों बांधा जाए?
तू भी है राणा का बंसज
फेंक जहाँ तक भाला जाए.
Last two lines (तू भी है राणा का बंसज. फेंक जहाँ तक भाला जाए. ) were written by Dr. Kumar Vishwas.
परमीत सिंह धुरंधर
तमाम उम्र तुम्हारा इंतज़ार हम करते रहे.
इस इंतज़ार में किस – किस को प्यार हम करते रहे (by Bhagwan Shahani).
अब भी आ जाओ कुछ नहीं बिगड़ा
अब भी हम इंतज़ार करते हैं (by Nusrat Fateh Ali Khan).
चाँद मेरी आँखों का इशारा जानता है
क्या करता है क्राससा, ये ज़माना जानता है.
अच्छा है की तू मेरी ना बनी
अब भी तेरे पीछे, ये दिल – दीवाना भागता है.
Wrote the last paragraph to express the same feeling “इंतज़ार”.
परमीत सिंह धुरंधर
ना खुदा मिला ना खुदाई
हर दर पर सजदा कर बैठे।
एक तुझको भुलाने के लिए
किस – किस से मोहब्बत कर बैठे।
परमीत सिंह धुरंधर
बागी – बलिया
विद्रोही – बाबा
लोहिया
के थाती
से उपजे हैं
निकले हैं
पनपे हैं.
यूँ ही नहीं हम बिगड़ैल हैं.
राजेंद्र बाबू के
पाठशाला से
जयप्रकाश के
गौशाला से
बुध और गुरु गोविन्द
के गांव से
महेंद्र मिश्र के तान से
हम पले – बढ़े
रचे – बसे हैं.
यूँ ही नहीं लोग हमें
छपरा – का – धुरंधर, बुलाते हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
दरजी न बाज आये
अपनी दगाबाजी से.
नाप ले ला चोली के
जोबन मल – मल के.
परमीत सिंह धुरंधर
हर शाम जल उठता हूँ चिरागे -दर्द बनकर
ना मैं किसी चाँद का हुआ, ना रात का हुआ.
यूँ मुफलिसी में आ गया हूँ इस कदर
ना मैं किसी घर का हुआ, ना घाट का हुआ.
मत पूछों हाल – जिंदगी मेरी
ना मैं जाम का हुआ, ना पैगाम का हुआ.
वो उजड़ कर भी आबाद हो गयीं
ना मैं मिट्टी का हुआ, ना हवाकों का हुआ.
परमीत सिंह धुरंधर
अर्ज किया है
किस्मतें – जंग देखिये।
उनका शहर
और मेरा रंग देखिये।
दौलत से सजी महफ़िलों
की वो चाँद हैं.
उनकी अमीरी की चमक
और मेरी गरीबी का हुनर देखिये।
परमीत सिंह धुरंधर
छोटी सी उम्र में
आई जवानी चढ़-चढ़ के.
कैसे मैं सम्भालूं?
इस पतली कमर पे.
छेड़े हैं हवाएं
लड़ाएं हैं निगाहें।
गली – गली में
बूढ़े भी बढ़-बढ़ के.
दरजी न बाज आये
अपनी दगाबाजी से.
नाप ले ला चोली के
जोबन मल – मल के.
छोटी सी उम्र में
आई जवानी चढ़ – चढ़ के.
कैसे मैं सम्भालूं?
इस पतली कमर पे.
परमीत सिंह धुरंधर
ये आँसू मेरी पलकों पे प्रेम के प्यासे हैं
ये कह रहें हैं, हम कितने तन्हा – अकेले हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
जो दरिया अपना अंदाज बदल ले
तो सागर प्यासा रह जाएगा।
जो भौंरा गर न बहके
तो कलियों का ख्वाब, ख्वाब रह जाएगा।
जिंदगी का ये फलसफा है
कोई, किसी के काम नहीं आएगा।
किस रब से माँगूँ की लौटा दे वो बचपन?
झूले तो बहुत हैं, वो गोद अब नहीं मिल पायेगा।
कितना दर्द है जिंदगी में, किसे सुनाऊँ बैठ कर
कौन है जो पिता बनकर मन को बहलाएगा?
सोचा नहीं था यादें इतना रुलायेंगी
तुम बिन जिंदगी, कृष्ण-बिन-द्वारका सा सूना रह जाएगा।
परमीत सिंह धुरंधर