तड़प – तड़प मेरी राहों को कोई मंजिल तो मिल जाए
गगन न सही, एक समुन्दर ही मिल जाए.
तप रही मेरी साँसों को एक प्याला तो मिल जाए
मधुशाला ना सही, गरल ही मिल जाए.
परमीत सिंह धुरंधर
तड़प – तड़प मेरी राहों को कोई मंजिल तो मिल जाए
गगन न सही, एक समुन्दर ही मिल जाए.
तप रही मेरी साँसों को एक प्याला तो मिल जाए
मधुशाला ना सही, गरल ही मिल जाए.
परमीत सिंह धुरंधर
हमार अदा पे सनम तू ऐसे ना बिछलSअ हाँ
चार दिन के जवानी बा, तू ऐसे मत छछलSअ हाँ.
एगो हमार नथुनिया ही बा सवा लाख के
बात – बात पे ऐसे मत तू जेब टटोलSअ हाँ.
सारा हमार आशिक़ बारन हमरा खेत में मजदूर
यूँ चारपाई पे हमरा तू हर रात मत आवSअ हाँ.
परमीत सिंह धुरंधर
ए जोगी तानी हमरो से रचाई न व्याह
शिव जइसन लेके, दुआर हमरा आईं न बरात।
काटतानी खटिया पे रात बिना अब नींद के
भौजी भइल बारी सखी, झगड़ा सब पाछे के भूल के.
केकरा से जाके कह दीं दिल के बात
रहल – रहल टिस उठे, जब पीसे बैठेनि जाँत।
ए जोगी तानी हमरो से रचाई न व्याह
शिव जइसन लेके, दुआर हमरा आईं न बरात।
लागल बारन हमरा पीछे, छपरा के धुरंधर
चढ़ल हमार जवानी पे रचSअ तारान काव्य सुन्दर – सुन्दर।
हम त बानी अपना धरम पे
लेकिन डर बाटे फिर भी हो जाईं ना हम बदनाम।
ए जोगी तानी हमरो से रचाई न व्याह
शिव जइसन लेके दुआर हमरा आईं न बरात।
This poem describe the meaning of marriage as per what I have seen in Bihar and other part of India. But now people don’t give importance to marriage until they go to court to fight against their partner.
परमीत सिंह धुरंधर
उड़ता है परिंदा
आसमा तेरी चाहत में
पर पाना ही तुझको
उसको ऐसा तो शौक नहीं।
खिलता हूँ लाखों पुष्प
रोज अपने बाग़ में
पर तोड़कर उनको माला पहनना
ऐसा मेरा तो शौक नहीं।
सागर सा तन्हा हूँ
पर मस्त हूँ अपने रंग में
नदिया का मीठापन चुराना
ऐसा मेरा तो शौक नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
अंग-अंग पे हसीना तेरे अत्याचार कर दूंगा
एक रात तुझे ऐसे बेक़रार कर दूंगा।
तू तड़प – तड़प के गिरेगी मेरी बाहों में
तेरे अंग-अंग को ऐसे आज़ाद कर दूंगा।
तेरा जोबन पिघल उठेगा मोम सा मेरी साँसों से
मैं तीली बनकर तुझमे ऐसी आग लगा दूंगा।
परमीत सिंह धुरंधर
अदा
अदा न होती
अगर औरत बेवफा न होती।
मुझसे पूछने वालों
अगर उनका दिल इतना मासूम होता
तो शौहर से उनकी उम्र आधी न होती।
जिस्म पे जो अपने रख लेती हैं दुप्पटा
घर से निकलते ही
शहर में सिर्फ दौलतवालों की वो साथी न होती।
नजर झुका कर, ओठों को सिलकर
जो बनती है बेबस और लाचार
उनके आशिकों की इतनी मजारें न होती।
परमीत सिंह धुरंधर
तेरे नयन है मेरे सघन वन
जिसमे विचरण करता है मेरा मन.
तू ना जाने क्या ढूंढती है जग में?
जब तुम्हारे लिए ही है मेरा उपवन।
काले – काले मेघों को
बाँध के अपनी जुल्फों में
फिर भी प्यासी -प्यासी हो
जाने किसकी चितवन में?
परमीत सिंह धुरंधर
अतः हे रही
राह का चुनाव कर
मंजिलो का क्या है?
वो तो हैं ही वेबफ़ा।
कठिन है जीवन साकी के बिना
सरल भी नहीं, अगर साकी बन जाए मधुशाला।
परमीत सिंह धुरंधर
ए जोगी तनी हमरो से रचाई ना व्याह
अंग-अंग खिल के जोहे राउर राह.
छोड़ दी हिमालय के तराई में तरपाल
बिछा के खटिया आईं
रउरा के खिलाई ताजा – ताजा पकवान।
अभी संजोग बा, अभी उम्र बा
ढल जाए जवानी तो रहें पच्छ्तात
फेन ना आई इ छपरा के पोठिया रउरा हाथ.
रोजे पठावत बारन बायना छपरा के धुरंधर Crassa
को छोड़ के जोगी तहरा के,
चढ़ जाइ हम डोली अब Crassa के साथ.
परमीत सिंह धुरंधर
कठिन है जीवन मधु के बिना
सरल भी नहीं, अगर मिल जाए मधुशाला।
Dedicated to Shir Harivansh Rai Bachchan.
परमीत सिंह धुरंधर