कैसा मिला बंधन?


तेरे गोरे – गोरे अंगों पे ये काले – काले नयन
ना जीने देते हैं, ना सोने देते हैं
ये मन को मेरे तूने कैसा दे दिया बंधन?

तेरे गोरे – गोरे वक्षों पे ये तीखे – तीखे नयन
ना पीने देते हैं, ना मरने देते हैं
ये जीवन को मेरे कैसा मिला बंधन?

परमीत सिंह धुरंधर

ईसा – राम


मेहनत से ही मिलता है खुदा
ये ही कह गए है ईसा.

राम भी उसी के हैं
जो करता है परमार्थ यहाँ।

परमीत सिंह धुरंधर

बनाये मुझे मवाली रे


ए गोरी तेरे अंग – अंग पे, खुदा ने कुदरत बरसाई रे
काली – काली आँखे तेरी, बनाये मुझे मवाली रे.

जी करता है चुम लूँ तुझको, बनके भौंरा हरजाई रे
कसी – कसी चोली तेरी, बनाये मुझे मवाली रे.

कटती नहीं राते अब, जब से देखि तेरी नाभि की गहराई रे
लहराती – बलखाती कमर तेरी, बनाये मुझे मवाली रे.

नींदें नहीं आती अब तो अकेले अपनी चारपाई पे
गदराई जवानी तेरी, बनाये मुझे मवाली रे.

परमीत सिंह धुरंधर

मेरा कर्म देख


ना मेरा शहर देख
ना मेरा सफर देख
देखना है तो बस
मेरा कर्म देख.

परमीत सिंह धुरंधर

अब किस्से चलेंगे


मुझे रिश्तेदार बनाकर वो खुद गुनाहगार बन गया
अब किस्से चलेंगे उसके मेरे इश्क़ के.
जाने किसके लिए खुदा ने बनाया था उसे
मुझसे नजर मिलकार वो बदनाम हो गया
अब किस्से चलेंगे उसके मेरे इश्क़ के.

परमीत सिंह धुरंधर

I have already parked my car


You will be my heart baby
You will be my heart.
Nothing can stop me
As I have already parked my car.

Till the 2 AM, I will be with you
Lets just chill and feel the spark.
We can still continue
By walking in the cold breeze
If you want to hold me in your arms.

Parmit Singh Dhurandhar

29 Nov


इस शहर के हर मोड़ पे अकेला – अकेला सा महसूस करता हूँ
घर किसी का भी टूटे, मैं टुटा – टुटा सा महसूस करता हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

शहर में जो भी ख्वाब हैं


शहर में जो भी ख्वाब हैं
सब उदास हैं.
घरों में बालकनी है
बालकनी में पौधें हैं
पौधों पे फूल और फूल पे तितलियाँ हैं
पर ना वो सुबह है ना वो शाम है.
शहर में जो भी ख्वाब हैं
सब उदास हैं.

अजीबो-गरीब रिश्ते हैं
झगड़ालू बीबी तो भागती प्रेमिका है
बिना शादी के होते बच्चे हैं
पर किसी को नहीं पता
कैसे किसके माँ – बाप हैं?
शहर में जो भी ख्वाब हैं
सब उदास हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

शहर


जिसको भी आता है घोंषला बनाना
इस शहर में उसी का घोंषला नहीं है.

कैसे सवारोगे किस्मत को Crassa?
किस्मत में बस यही एक चीज़ लिखी नहीं है.

उड़ रहे हैं बहुत परिंदे आसमा में
मगर दूर – दूर तक इनका कोई आशियाना नहीं है.

संभालना सिख लो गलियों में ही
ये शहर देता दोबारा मौका नहीं है.

उजड़ा है मेरा गुलिस्ता यहीं पे कभी
मगर शहर ये अब भी शर्मिन्दा नहीं है.

परमीत सिंह धुरंधर

लता – Crassa


तुम लता बन कर बाँध रही हो
मैं तना बन कर छुप रहा हूँ.
तुम पुष्प सी पुलकित हो कर
मेरी डालो पे खुशबु बिखेर रही हो.
और Crassa कण – कण में
पिंक – पिंक होकर बिखर रहा है.