लचक होनी चाहिए पतंगों सी


लचक होनी चाहिए जिंदगी में पतंगों सी,
दूर तक सफर करती हैं, कट के भी.
आसमाँ को छूने की ललक इतनी है,
की हवाओं का जोर जितना,
उतना ही ऊंचा हैं उठती।

 

परमीत सिंह धुरंधर

नजरों के मयखानों में


तेरे नजरों के मयखानों में डूब जाऊं,
और तू ना निकलने दे.
अगर निकल जाऊं तो तू फिर,
किसी और नजर पे ना बहकने दे.
मुझे याद है तेरा,
जुल्फों को यूँ ही आगे – पीछे करना।
इन्हे अब मेरी रात बना दे,
या फिर बन घटा बन कर बरस जाने दे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हमरे खटिया पे सवार रहलू


याद करअ जहियाह कुंवार रहलू,
अंग – अंग से तू हमार रहलू।
करवाचौथ के उपवास हमारा नाम पे
हर सोमारी सावन के हमरे खातिर करत रहलू।
शिव जी से हमरे के माँगत हर बार रहलू।
याद करअ जहियाह कुंवार रहलू,
अंग – अंग से तू हमार रहलू।

अइसन कउनो ना इतवार नागा भइल,
जब तू ना हमारा बथान में ओंघाइलु।
हमरा बैलन के तू ख़ास प्यार रहलू।
याद करअ जहियाह कुंवार रहलू,
अंग – अंग से तू हमार रहलू।
खोटत हमरे खेतिया के साग रहलू,
हमरे बगिया के कचनार रहलू।
हमरे खटिया पे सवार रहलू।
याद करअ जहियाह कुंवार रहलू,
अंग – अंग से तू हमार रहलू।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हमारा जोड़ के कोई लइका


अंग – अंग खिल के कठोर भइल बा,
भौजी भैया से कह तनी ढूँढअस,
हमारा जोड़ के कोई लइका।
सखी – सहेली सब तहरा खानी,
जाके बइठ गइली अपना ससुरा,
केकरा संगे अब खेले जाईं सबके अँगना।

 

परमीत सिंह धुरंधर

बलिदान हो – बलिदान हो


वक्त की पुकार पे,
रक्त का दान हो.
स्वतन्त्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

सर्प सा जीवन
बिल में संकुचित हो.
या नभ में अनंत तक,
विस्तृत हो विस्तार हो.
स्वतन्त्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

सोच लो, विचार लो,
सौ साल के जीवन में,
साँसों पे बोझ हो.
या शोषण की कालजयी बेड़ियों पे,
बन काल,
प्रहार हो, प्रहार हो.
स्वतन्त्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

स्वर्ग से देवता नहीं आयेंगें योगदान को,
नारियों के गर्भ से ना निकलेंगें नारायण,
जो इंतज़ार हो, इंतज़ार हो.
हमें ही चुनना है अपने पथ को, अंत को,
मिटाने को ये गहन अन्धकार,
ना हो अब सूर्या का इंतज़ार,
अब मशाल लो, मशाल लो.
स्वतन्त्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

रूप – रंग का त्याग कर,
रण को प्रस्थान हो.
काम – क्रीड़ा को छोड़कर,
प्रेम से मुख मोड़ कर,
भय पर,
विजय हो, विजय हो.
नर ही नहीं केवल,
नारी के हाथों में भी कृपाण हो.
स्वतन्त्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

गुरु ही नहीं,
अब माँ से भी अव्वाहन हो.
की पुत्रों को बतायें,
वे वीरों की संतान हैं.
सिंह सा गर्जन करें,
कल अपने संतान फिर,
निर्भीक – निर्भय भविष्य के लिए,
कुशाषकों का,
संहार हो, संहार हो.
स्वतन्त्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

वक्षों पे बुद्ध सी है शांति


भीषण – प्रचंड अग्नि से
धधकते वक्षों पे बुद्ध सी है शांति।
स्वर्ण सा सुशोभित अंगों को
शर्म से हैं बांधती नैनों की पंखुड़ी।
चन्दन से शीतल नितम्बों पे
डोलती – फुफकारती
काले केसूओं की
समृद्ध – गहन कुंडली।
उम्र के पड़ाव पे
वृद्ध भी फिसल रहे.
कामाग्नि में जल कर
तरल बनी है जिंदगी।

पुष्प क्या ? पवन क्या ?
सूर्य, चंद्र, मेघ और नक्षत्र क्या?
कीट और पतंगे भी
डोल – डोल अंगों पे
रसपान कर रहे.
रुत है, रीत है
मन में पुष्पित प्रीत है.
बिन सावन के ही,
नस – नस में तरगों को
नयन उसके सिर्जित और प्रवाहित कर रहें.
धरा क्या? नभ क्या?
अंग – अंग
विश्व को पोषित और संचालित कर रहें।

 

परमीत सिंह धुरंधर

जेब पे भार


सारा शहर मेरे इश्क़ का चर्चा कर रहा है,
उनको क्या खबर है?
मेरे जेब पे कितना भार पर रहा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

नित यौवन जिसका चढ़ रहा


तिमिर के शिविर में चंद्र को परास्त करे,
उषा की लाली को आरम्भ में, नभ में ही अस्त करे.
चक्षुओं के बाण से हर मान का मर्दन करे.

विकट जिसका रूप नहीं, विकट उसकी चाल रे,
कोमल – कोमल अंगों पे, विशाल नयन कटार से.
काले -काले केसूओं के मध्य तांडव करे नितम्ब रे.

विकसित उन्नत वक्षों से विश्व को विस्मित करे.
पुलकित अपने अधरों से हिमालय को कम्पित करे.
हिम से ढके आँगन के अन्तःमन को पावक सा प्रष्फुटित करे.

नित यौवन जिसका चढ़ रहा समुन्द्र के ज्वार सा,
अंग – अंग खिल रहा पूर्णिमा के चाँद सा.
शीतल – मधुर – चंचल पवन सा,
नस – नस को काम से ग्रसित और स्पंदित करे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मर्द हैं वों


इशारों को अगर समझों तो राज को राज ही रहने दो,
किस्से तो बहुत हैं मगर उनपे थोड़ा पर्दा भी रहने दो.

सब कहते हैं की मैं उनसे फंस गयीं हूँ,
मर्द हैं वों, चेहरे पे उनके दर्प, झूठा ही सही पर रहने दो.

अगर पंखुड़ियां ना खोले कलियाँ अपनी,
तो कैसे कोई भौरां, पराग कणों को चुरा ले जाए।

भोले – नादान हैं भोरें,
उन्हें यूँ ही लुटेरे बनके इठलाने दो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मतलब


मुझे गर्व है की मैं किसी को अपना नहीं बना पाया,
पर इसका मतलब है की कोई मुझे नहीं फंसा पाया।

 

परमीत सिंह धुरंधर