तुम्हारा रूप देख, सूरज तपता है,
मगर तुम्हारी जिस्म को बस चाँद छूता हैं.
नहीं चाहिए वो हुस्न मुझे,
जिसकी जवानी उसपे ये दोहरापन लाता है.
परमीत सिंह धुरंधर
तुम्हारा रूप देख, सूरज तपता है,
मगर तुम्हारी जिस्म को बस चाँद छूता हैं.
नहीं चाहिए वो हुस्न मुझे,
जिसकी जवानी उसपे ये दोहरापन लाता है.
परमीत सिंह धुरंधर
It’s good to be used,
But not to be misused.
so, don’t cry every time,
whenever I see you.
If you need me,
let me know, let me know.
But if you need just a shoulder,
let me go, let me go.
Rivers flow,
Just to loose all their water.
Trees grow,
Just to invite insects to eat their fruits.
If you want to loose,
let me know, let me know.
But if you still want to win,
let me go, let me go.
Parmit Singh Dhurandhar
I was crazy for baby you,
But I got a new crew.
Once I was on the floor,
Wine looked better than you.
For full four hours,
I got a memory loss.
I know you are angry,
But that was not my fault.
With the dim light and music on,
Wine looked hotter than you.
I was crazy for baby you,
But I got a new crew.
Once I was on the floor,
Wine looked better than you.
Parmit Singh Dhurandhar
हम इकिस्वी शताब्दी में आ गए,
उनको शिक्षा मिली,
उनको अधिकार मिले,
नारी आज चाँद पे पहुँच गयी.
पर हुस्न की नियत पे हम क्या लिखे?
आज भी दस-दस पुत्रियों के,
माता-पिता नहीं चाहते की,
उनका पुत्र,
किसी लड़की के प्रेम में पड़े.
परमीत सिंह धुरंधर
जो इंसान,
परेशान है सारे शहर में.
शायद वो किसी का,
बाप हैं.
शायद उसका पुत्र,
पड़ गया है किसी के इश्क़ में.
और उसके बुढ़ापे का,
वो एक ही चिराग है.
परमीत सिंह धुरंधर
समंदर जब अपने ज्वार-भाटे के उबाल पे था,
तब कसा था मैंने उसे अपने बाहों में.
मेरे मिटने के बाद, उतारी हैं जमाने ने,
कस्तियाँ अपनी उसके लहरों पे.
वो जो बखान करते हैं महफ़िल-महफ़िल
अपनी रातों का.
नहीं जानते की कितने परवाने सोएं हैं,
उनसे पहले, उनकी शर्मीली शमा के आगोस में.
परमीत सिंह धुरंधर
ज़माने भर की दौलत कमा कर भी,
एक प्यास नहीं मिटती।
खूबसूरत जिस्म को पाकर,
रातें तो काट जाती हैं.
मगर अपनी मिटटी की सरहदों से दूर,
वो मीठी नींदें नहीं मिलती।
किस्मत में सबकुछ पाकर भी,
कितना तरपता हूँ माँ तेरे लिए.
की आज भी मेरी थाली की रोटियों में,
वो खुश्बूं तेरे हाथों की,
और वो स्वाद नहीं मिलती।
परमीत सिंह धुरंधर
तुम मिले, तो सबको चाहत हुई,
यूँ ही नहीं जिंदगी बचपन से जवान हो गयी.
तुम्हारी चाल देखके, बीच गयी सबकी आँखे,
यूँ ही तुम्हारे सीने पे, नहीं तलवारे तन गयीं।
परमीत सिंह धुरंधर
बिस्तर की चाहत क्या होती है?
ये उन जाड़े की रातों से पूछो।
जिनके ख्वाब टूट जाते हैं,
सुबह की किरणों से.
चादर की सिलवट क्या होती है?
पूछों उन रातों से, जो ढल जाती हैं,
अपने अधूरेपन को छुपाने में.
परमीत सिंह धुरंधर
हम उन मयखानों के नहीं,
जिनके प्याले टूटते नहीं।
हम उन सितारों के भी नहीं,
जो अपनी चाल बदलते नहीं।
हमने तो इश्क़ उससे किया,
जिसका नाम आज तक वफादारों में नहीं।
उस चाँद की आशिकी ही क्या?
जिसमे कोई दाग नहीं।
उस दरिया की मस्ती ही क्या?
जो अपने किनारों को डुबाता ही नहीं।
हमने तो इश्क़ उससे किया,
जिसका नाम आज तक वफादारों में नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर