खूबसूरती तुममे इतनी है की,
चिरगों में रौशनी की कमी है.
गुरुर मुझमे इतना है की,
दुश्मनो की संख्या बढ़ती जा रही है.
परमीत सिंह धुरंधर
खूबसूरती तुममे इतनी है की,
चिरगों में रौशनी की कमी है.
गुरुर मुझमे इतना है की,
दुश्मनो की संख्या बढ़ती जा रही है.
परमीत सिंह धुरंधर
तुम बोलोगी तो प्यार होगा,
तुम साथ चलोगी तो प्यार होगा।
मेरा जान तुम्हारी हर पसंद पे,
मेरा हाँ होगा।
दुस्मनी है मगर ज़माने से मेरी,
मेरी राहों पे काँटों का अम्बार होगा।
परमीत सिंह धुरंधर
मैं कान्हा ना बन पाया,
पर तू यशोदा ही है माँ.
मैं राम ना कहला पाया,
पर तू कशोल्या ही है माँ.
मैं ना तोड़ पाया तेरे बंधन,
पर तूने मुझे झूला झुलाया।
मैं शिवा जी सा ना लड़ पाया,
पर तू जीजाबाई ही है माँ.
परमीत सिंह धुरंधर
Respect mom and not religion.
बहुत दौलत कमा के मैंने माँ से पूछा,
बोल माँ तुझे क्या चाहिए?
तो माँ बोली, “चल गरम कहना बनाया है, खा ले जल्दी से.”
परमीत सिंह धुरंधर
जब उसने मेरे दिल को तोड़ा,
ठोकर – पे ठोकर लगा के.
तब मुझे एहसास हुआ, धुप में,
नंगे पैर चलती माँ के प्यार का.
परमीत सिंह धुरंधर
Respect mom and not religion.
जो सिर्फ सूरत देख के मुस्करा दे,
वो माँ है.
जो जेब की भार देख के मुस्कराए,
वो औरत है.
जो कीचड़-मिटटी से सने देह को,
अपने सबसे सुन्दर साड़ी से पोंछे,
वो माँ है.
जो रात में बाहों में आके भी, बाजार की,
साड़ियों और गहनों की बात करे,
वो औरत है.
परमीत सिंह धुरंधर
बहुत दौलत कमा के भी,
जब खुशियाँ दूर ही रही.
तो हमने घुंघरुओं पे,
लुटा दी साड़ी दौलत।
माँ के लिए,
एक साड़ी भी नहीं खरीद सके,
ये गम रहा हमको।
उस सुकून को,
फिर से पाने के लिए,
पहनते हैं पैंट में लगा कर पैबंद।
परमीत सिंह धुरंधर
तुम्हारी लबों से होकर गुजरा जो पल,
फीका लगने लगा ये ताजो – ये तख़्त।
एक पल में सब गुरुर बिखरने लगा,
कितना बड़ा फकीर है ये शहंशाहे-हिन्द।
परमीत सिंह धुरंधर
माई कहले बारी,
तहसे हम बात ना करीं,
की तू बड़ा बदनाम बड़ा हो.
हमार माई कहले बारी,
तहके घर ले चलीं,
की ताहार नाक बाटे सुन्दर बड़ा हो.
चलअ, हटअ पीछे, हमके मत छेडअ हमके,
बाबुल से पहले मांगअ ई हाथ हो.
देखअ ताहरा खातिर कंगन ले आइल बानी,
पाहिले पहनाएम ई ताहरा हाथ हो.
देखअ हाथे तक रहअ, पहुँचा मत धरअ,
हमार धड़कअता अब दिल हो.
त छोड़अ माई – बाबुल के चिंता,
अब हो जाएगअ सार खेल हो.
परमीत सिंह धुरंधर
तेरी आँखे मुझसे कह रही है,
यूँ साँसों की दूरी अब अच्छी नहीं।
तो छोड़ दे ये शर्म ए गोरी,
तेरी कोरी जवानी अब अच्छी नहीं।
कब तक संभालेंगे बाबुल तुझको,
ढलकने लगा है तेरा आँचल।
यूँ मायके में चढ़ती जवानी अच्छी नहीं।
अंगों में तेरे इतना कसाव,
जैसे मन में छुपा हैं कोई डर.
यूँ डरती – खामोश जवानी अच्छी नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर