पंछी


तेरी नजर के दीवाने सभी,
लूटेंगे सरसों के दाने सभी।
मेरे चबूतरे पे आके तू चर,
मुझ सा कबूतर ना मिलेगा कहीं।
तेरी कमर के दीवाने सभी,
खाने को झटके हैं तैयार सभी।
मेरे घोंसलें में तू आके रहा कर,
मुझ सा पंछी न होगा कहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

मथुरा-छपरा


सैया के बाहों में बा ऐसा नशा,
की लूट गयील मथुरा,
पर आइल मजा.
जब दोनों तरफ से तीर चले लागल,
तो धधक गईल छपरा,
पर आइल मजा.

परमीत सिंह धुरंधर

आदमी


अँधा-धुंध दौड़ता आदमी,
क्या पा लेगा।
ठोकर लगेगी,
और सब बिखर जाएगा।

परमीत सिंह धुरंधर

समंदर


दिल मेरा टूट गया,
समंदर में जाकर।
पर, अब भी तन्हा है समंदर,
मेरी तन्हाई को पाकर।
लहरों का धनी समंदर,
मुझ फकीर पे क्या हंसेगा।
वो समेटता है जिन मोतियों को,
मैं चलता हूँ उन्हें ठोकरों से उड़ा कर।

परमीत सिंह धुरंधर

दर्द


मेरी नज़रों में झांककर,
न देख मेरे दर्द का लिबास।
बस रातें हीं काली हैं यहाँ,
पर जल रहे है दूर तक चिराग।

परमीत सिंह धुरंधर

मैं थोड़ा – थोड़ा टूट कर तुम में मिलना चाहता हूँ


मैं नहीं जानता की प्रेम का,
इजहार कैसे और कब होता है.
मैं नहीं जानता की दिल का,
विश्वास कैसे जीता जाता है.
मैं नहीं जानता की कोमल ह्रदय को,
कैसे सहेजा और संभाला जाता है.
मगर, ये अब जान गया हूँ की,
की इन आँखों में देखते हुए,
जिंदगी को जीना चाहता हूँ.
इन आँखों में डूबकर ,
हर इक पल रहना चाहता हूँ.
इन आँखों के सपनो को,
अपना कहना, अपना बनाना चाहता हूँ.
इन ओठों की मुस्कराहट को,
सहेजना, सम्भालना चाहता हूँ.
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मुझे नहीं मालुम कब मेरी जिंदगी की,
राहें समतल होंगी।
मुझे नहीं मालुम कब बहारें मेरे,
क़दमों को चूमेंगी।
मुझे नहीं मालुम तुम कब तक,
मेरे साथ चलोगी।
मगर, मैं अब तुम्हार्री बाहें,
थामना चाहता हूँ.
हर पथरीली, कंटीली राहों पे,
तुम्हे गोद में उठा कर चलना चाहता हूँ.
अनुकूल – प्रतिकूल, वक्त के हर थपेड़ों में,
तुम्हे हँसते, खिलखिलाते, देखना,
तुम्हे सम्भालना चाहता हूँ.
तुम्हे अपनी नदी और खुद को,
तुम्हारा किनारा बनाना चाहता हूँ.
तुम्हारी धाराओं के हर मिलन पे,
मैं थोड़ा – थोड़ा टूट कर,
तुम में मिलना चाहता हूँ.
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मेरा प्रयास हो तुम,
मेरा होसला हो तुम.
मेरे आखिरी क्षणों तक,
मेरा ये ही प्रयास रहेगा।
तुम्हे पाने की,
तुम्हे मुस्कराने की.
तुम्हे सहजने की,
तुम्हे सँभालने की.
तुम्हे हर सुकून,
खुद को बेचैन रखना चाहता हूँ.
तुम्हे हर ख़ुशी,
खुद को गम देना चाहता हूँ.
मैं अपनी हर निराशा को,
तुम्हारे ओठों का ख़्वाब देना चाहता हूँ.
राते अमावस की हो या पूर्णिमा की,
मैं हर रात तुम्हारे साथ,
एक नया दीप जलाना चाहता हूँ.
मुझे नहीं मालुम तुम्हे कैसे यकीन दिलाऊं,
मगर, मैं तुम्हारे पावों को,
अपने खून की मेहंदी देना चाहता हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

प्रेम


तेरी तस्वीरों को देखकर,
जीने वालों में मैं नहीं.
मेरा प्रेम तो सागर है,
इसमें किनारों का बंधन नहीं.
लहरे उठने लगीं हैं,
तुम्हे भिगोने को.
एक कदम तो तुम इधर उठाओं,
अब कुछ भी असंभव नहीं.

परमीत सिंह धुरंधर

ओ शाम्भवी


ओ शाम्भवी, वो शाम्भवी,
तुझसे ही है मेरी हर ख़ुशी।
संग ही तेरे खेलना है,
अब तो जीवन की हर होली।
सागर की लहरें हों,
और तुम हमारे साथ.
किनारों पे बैठें हम,
देखें एक साथ ये आसमान।
हर तारे की गिनती पे,
हो तेरे करीब आने का अहसास।
तेरे मिलने के बाद ही,
मेरी हर प्यास है बढ़ी.
ओ शाम्भवी, वो शाम्भवी,
तुझसे ही है मेरी हर ख़ुशी।

परमीत सिंह धुरंधर

हौसला


मंजिलों का क्या है,
राहें भटका देतीं हैं.
राहों का क्या है,
मंजिले मिटा देती हैं.
अपने हौसलों से,
चलता है मुसाफिर,
वरना आँधियाँ तो,
हर चिराग बुझा देती है.
दर्द पे अपने लबों को,
सी ले तू.
ख़राब मौसम तो,
पुराना हर रोग बढ़ा देती है.

परमीत सिंह धुरंधर

प्रणय की रात


ग़मों की रातें, हैं छट रहीं.
कोई आ रहा हैं ख़्वाबों में.
दूर तक हैं रौशनी,
बिना चाँद के ही आसमानों में.
हवाएँ भी उठने लगीं,
न जाने क्यों साथ मेरे बहने को.
हर दर्द है मिट रहा,
बिना मेरे फरियादों के.
ग़मों की रातें, हैं छट रहीं.
कोई आ रहा हैं ख़्वाबों में.

परमीत सिंह धुरंधर