प्रण और चुम्बन


जब ग़मों की रात हो, प्रिये,
तुम ओठों से पिला देना।
जब नींदें न हों आँखों में,
ख़्वाब न हो जीने को.
तुम आँचल अपने सरका के,
अंगों को छलका देना।
कांटे – ही – कांटे हो पथ में,
और प्यास से कंठ भी अवरुद्ध हो.
तुम आँखों की मदिरा को अपने,
मेरे नस – नस में उतार देना.
जब तुम ही मेरे साथ तो,
तब विकत क्या है कोई प्रण मेरा.
मेरे हर पराजय पे भी तुम यूँ ही,
विजय श्री का मीठा चुम्बन लगा देना.

परमीत सिंह धुरंधर

मैं भगीरथ सा अडिग हूँ


मैं धीमा – धीमा,
पर प्रबल हूँ.
तुम त्वरित-त्वरित,
पर क्षणिक हो.
मैं दीप, दीपक सा,
प्रज्जवलित हूँ.
तुम अग्नि सा,
प्रचंड हो.
यह जंग हैं,
अपने इरादो की.
मेरे प्रयासों की,
तुम्हारे लालसाओं की.
तुम सुरसा सा,
विकृत हो.
मैं भगीरथ सा,
अडिग हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

जंगे-जीत हासिल करेंगें


घरौंदें,
मिटटी के.
बनते ही हैं,
टूटने के लिए।
मगर इन्हे,
घर बंनाने के लिए।
आखिरी साँसों तक,
हम लड़ेंगे।
वो निकलें हैं,
बैठ के हाथी पे।
अपने मद में,
मतवाले।
हम नंगे पाँव ही,
ज़मीन पे खड़े होकर,
उनका सामना करेंगे।
कहता रहे जमाना,
हमें नादान,
नासमझ, नालायक।
हम अपनी,
अनुभवहीनता के बावजूद।
ये जंगे-जीत,
हासिल करेंगें।

परमीत सिंह धुरंधर

सावन


अबकी बरस रानी, अबकी बरस,
तहरा के उठा के ले जाएं।
सावन बरसे या न बरसे,
अंग – अंग ताहर भिंगो देहम।

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


मेरा इश्क़ मेरा इश्क़ है,
उनका हुस्न मेरा नहीं।
चाहत तो मुझे उन्ही की है,
मगर उनका जिस्म मेरा नहीं।
ये न इबादत है,
ना कोई जद्दोजहद उन्हें पाने की।
धड़कनो में मेरे महक है,
बस उन्हीं के आँचल की।

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़ का गाँठ


मैं बहारों सी आई हूँ,
तू इश्क़ बनके छा जा.
मैं रेशम की धागा सी,
तू उसमे गाँठ बनके पड़ जा.
मैं बलखाऊं, लहराऊं, हवाओं सी,
तू मेरी राहों में पर्वत बनके आजा.
जब शाम ढले, तू ताड़ छेड़े,
मेरी रातों को बादल बनके भिंगो जा.

परमीत सिंह धुरंधर

मेरा संघर्ष भी जारी है


प्रयास है जमाने का,
हमको मिटाने की.
मेरा संघर्ष भी जारी है,
हर गम में मुस्कराने की.
अकेला ही खड़ा हूँ,
एक दिन तो गिरना है.
पर अपनी भी चेष्टा हैं,
सबको झुठलाने की.
बादलों ने मुख मोड़ा है,
हवाओं ने रुख बदला है.
सब विरुद्ध में हैं खड़े,
पर माँ संग में है लेके,
दुवाओं की झोली।
प्रयास हैं लहरों का,
हमको उखारने की.
मेरा संघर्ष भी जारी है,
अपने हर निशाँ को बचाने की.
प्रयास है जमाने का,
हमको मिटाने की.
मेरा संघर्ष भी जारी है,
हर गम में मुस्कराने की.

परमीत सिंह धुरंधर

धनिया से धान भइल बारु


जब से जवान भइल बारु,
धनिया से धान भइल बारु.
चमकअ तारु, चमकावअ तारु,
नाक में नथुनिया डाल के.
लहकअ तारु, लहकावअ तारु,
योवन पे चुनरी डाल के.
पूरा खिल के खलिहान भइल बारु,
जब से जवान भइल बारुं,
धनिया से धान भइल बारु.
रूप ताहर नयका,
रंग ताहर नयका.
सोना के भाव भइल बारु,
जब से जवान भइल बारुं,
धनिया से धान भइल बारु.
महकअ तारु, महकावअ तारु,
केसिया में गजरा डाल के.
छलकअ तारु, छलकावअ तारु,
अँखियाँ में कजरा डाल के.
सरसो से महुआ भइल बारु,
जब से जवान भइल बारु,
धनिया से धान भइल बारु.
लहर उठा दअ ,
जहर पिला दअ.
अंग-अंग से गुलाब भइल बारु,
जब से जवान भइल बारु,
धनिया से धान भइल बारु.

परमीत सिंह धुरंधर

पिता


जमाने ने हमें सराहा नहीं,
और हमने कभी हार मानी नहीं।
उस तरफ हैं महफ़िलें,
और उनकी दीवालियाँ,
और हमने अभी तक जुगनुओं से,
अपनी ये दोस्ती तोड़ी नहीं।
सुख, सत्ता और खूबसूरत जिस्म की चाह में,
कुछ दोस्त उधर जाके बैठ गए।
सम्मान, दौलत और आगोश की लालसा में,
हुस्न वाले भी वहीं के होके बस गए।
झुलस रहा है मेरा तन धुप में,
और कंठ तरस गया है, दो बून्द पानी को।
वीरान और सुनसान, इन शाखाओं को,
फिर भी, जाने क्यों और किस उम्मीद में,
अभी तक हमने छोड़ा नहीं।
क्या दौलत सजों के रखें हम,
और किस लिए।
पिता के जाने के बाद,
किसी और गोद में,
जब अब तक मैं बैठा नहीं।
जमाने ने हमें सराहा नहीं,
और हमने कभी हार मानी नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

आज़ाद साँसें


ग़मों से सजी जिंदगी,
खुशहाल हैं.
अगर ये साँसें,
मेरी आज़ाद हैं.
क्या होगा,
वैसी ख़ुशी का.
जिसमे आँखे झुकीं,
और तन पे,
सोना-चांदी का,
चमकता लिबास है.
भूख से बिलखती रातें,
खुशहाल हैं.
अगर हर सुबहा पे,
मेरा इख्तियार है.
क्या होगा उन ख़्वाबों को,
देखकर,
जिसपे किसी के हुक़्म का,
पाबन्द है.
ग़मों से सजी जिंदगी,
खुशहाल हैं.
अगर ये साँसें,
मेरी आज़ाद हैं.

परमीत सिंह धुरंधर