हम जिस तहजीब की तरफ बढ़ रहें हैं दोस्तों,
वहाँ महबूब तो कई हैं, सर्द रातों में,
जिस्म को सहलाने को.
मगर, हम जिस माटी को छोड़ रहें हैं दोस्तों,
वहाँ माँ आज भी अकेली है, राह देखती,
हमारे लौट आने को.
परमीत सिंह धुरंधर
हम जिस तहजीब की तरफ बढ़ रहें हैं दोस्तों,
वहाँ महबूब तो कई हैं, सर्द रातों में,
जिस्म को सहलाने को.
मगर, हम जिस माटी को छोड़ रहें हैं दोस्तों,
वहाँ माँ आज भी अकेली है, राह देखती,
हमारे लौट आने को.
परमीत सिंह धुरंधर
जो लिख रहें हैं कलम-वाले,
पत्नियां बदलती हैं समाज को.
वो क्या समझेंगें, कैसे पला था,
जीजाबाई जी ने, शिवा जी महाराज को.
परमीत सिंह धुरंधर
वो करती है गुजरा, थाली में बचे चाँद चावल के दानें से.
माँ तो मात देती भूख को भी, बस बेटे के मुस्कराने से.
परमीत सिंह धुरंधर
मुझे पीने का शौक हैं,
तू पिलाने की शौक़ीन बन.
छोड़ ये वफ़ा, बेवफाई की बातें,
तू एक बार तो,
इन बादलों की जमीन बन.
मुझे बरस कर,
मिट जाने का डर नहीं।
तुझे भींग कर,
लहलहाने में भय है.
कब तक टकटकी लगाओगे,
खुदा के दर पे मदद की,
कभी तो अपने योवन का यकीन बन.
परमीत सिंह धुरंधर
मेघनाथ: प्रणाम काका श्री. अच्छा हुआ, आप दिख गए. मई असमंजस में था की आप से मिलकर रणभूमि में जाऊं या जाकर मिलूं।
विभीषण: पुत्र, मैं तो तुम्हारा सदा से शुभचिंतक रहा हूँ. मेरी तुमसे कोई बैर नहीं है पुत्र.
मेघनाथ: हा हा हा हा!! काका श्री, पिता से बैर और उसके पुत्र से प्रेम। मैं वैसा पुत्र नहीं हूँ.
विभीषण: मैं तुम्हारे पिता का सागा भाई हूँ, उनका बैरी नहीं।
मेघनाथ: तो दुश्मनों की छावनी में क्यों ?
विभीषण: क्यों की, लंकेश धर्म भूल चुके हैं. तुम तो ज्ञानी हो. मैंने भ्राता कुम्भकर्ण को भी समझाया। तुम्हे भी कहता हूँ, ये युद्ध छोड़ के श्री राम के शरण में आ जाओ. इसमें हम सब का भला छुपा है.
मेघनाथ: बहुत-बहुत धन्यवाद काका श्री। अगर सबका भला इसी में छुपा रहता तो आपकी माता श्री आज यहाँ आपके साथ होती, वहाँ लंका में नहीं।
मेघनाथ: अगर श्री राम भगवान भी है, और स्वयं नारायण भी अपने असली रूप में आ जाएँ, तो भी मैं लंका का प्रतिनिधित्व करूंगा।
मेघनाथ: आखिर में इतना ही कहूँगा, काका श्री की “बाप ने जिंदगी दी है….. बाप के लिए जिंदगी दे दूंगा।”
परमीत सिंह धुरंधर
खूबसूरत से एक मोड़ पे,
तन्हा सा मैं बैठा था.
तू गली में जब निकल कर आई,
किस्तों में दिल टुटा था.
नजरे झुका कर, तू चल रही थी,
अपने आँचल में सब कुछ छुपाएँ,
तेरी लहराती जुल्फों की,
हर लट से मेरा दिल उलझा था.
परमीत सिंह धुरंधर
योवन के धुप में,
तू ऐसे है खिल गयी.
जैसे अमीरों के बस्ती में,
गरीबों के चादर उड़ी.
तेरे अंगों पे ऐसे बहकने लगे,
मोहब्बत के परवाने।
जैसे छोटी सी बस्ती में,
होली में भांग हो बटी.
परमीत सिंह धुरंधर
दो तेरी पलकें वो रानी,
दो ही मेरे ख़्वाब हैं.
छोटे से इस आसमान का,
तू ही एक चाँद है.
दो तेरे नखरे वो रानी,
दो ही मेरे अरमान हैं,
इस छोटी सी सल्तनत की,
तू ही एक तख्तो-ताज है.
परमीत सिंह धुरंधर
उनकी उम्र की खबर तो सारे जमाने को हैं,
मेरा दर्द कोई तौल दे तो जाने.
उनके आँचल से तो ख़्वाब सब बुनते हैं,
मेरा ख़्वाब तौल दो तो समझें.
परमीत सिंह धुरंधर
हम इश्क़ तुमसे करते रहें, और शिकायत खुद से.
तुम्हारी बेवफाई पे भी, हम अपनी वफ़ा ढोते रहें.
परमीत सिंह धुरंधर