जिंदगी से मुझे मोह तब हुआ,
जब तेरी गोद में मैं खेला, पिता .
और जिंदगी से मोह भी तब टूटा,
जब तुझे काँधे पे ले के चला.
परमीत सिंह धुरंधर
जिंदगी से मुझे मोह तब हुआ,
जब तेरी गोद में मैं खेला, पिता .
और जिंदगी से मोह भी तब टूटा,
जब तुझे काँधे पे ले के चला.
परमीत सिंह धुरंधर
ए सितारों बरसना सीखो,
बादलों से मेरी जंग छिड़ चुकी है.
अब वो नहीं बरसेंगे मेरी जमीन पे,
और मैं नहीं विचरने दूंगा उन्हें,
अपनी सरहदों पे.
ए सितारों गरजना सीखो,
बिजली से मेरी जंग छिड़ चुकी है.
वो गरजेगी हमारी सरहदों में,
डराने को हमें.
हम भी ललकारेंगे उसे,
अपनी जमीन पे मशाल जला के.
परमीत सिंह धुरंधर
मैं ख़्वाब देखता हूँ,
मैं ख़्वाब देखता हूँ.
मेरे वृक्षों पे फल नहीं लगते,
फिर भी मैं उनको सींचता हूँ,
मैं ख़्वाब देखता हूँ.
बागों में अपने मैं आम नहीं,
शीशम लगता हूँ,
मैं ख़्वाब देखता हूँ.
मेरे तालाब की मछलियाँ,
किनारों पे तैरती हैं.
और मैं बीच पानी में,
बंसी डालता हूँ,
मैं ख़्वाब देखता हूँ.
हर शाम हारता हूँ,
युद्ध जीवन का.
पर नयी सुबह में,
नयी रणभेरी छेड़ता हूँ,
मैं ख़्वाब देखता हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
आज दिवाली में बलम जी,
मुझे चाहिए नए झुमके.
और जलाऊँगी दिए,
आपके संग घूम- घूम के.
आज दिवाली में बलम जी,
मैं जाउंगी मायके।
और जलाऊँगी दिए,
सखियों संग सज-सवर के.
परमीत सिंह धुरंधर
जवानी के ढलने का इंतज़ार कर रहा हूँ,
वो उम्र देख रही हैं मेरी,
और मैं दिल से जवान हो रहा हूँ.
कल तक जो छत पे निकलती थीं,
गलियों में देखती थीं.
अब घंटो बैठती हैं आईने के पास,
और मैं उनकी गलियों में,
चक्कर लगा रहा हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
दो रात बाहों में आये,
दो पल मुस्करा के.
दो जिंदगियां तबाह कर गए,
दो सर्द-रात संग में गुजार के.
परमीत सिंह धुरंधर
जिसकी एक चाल पे दुनिया मिट गयी,
जाने कैसे हमने अपनी साँसों को संभाला है.
परमीत सिंह धुरंधर
अब भूख लगी है,
प्यास मिटने के बाद,
की रात का इंतज़ार नहीं होता,
मंडप में तुम्हे देखने के बाद.
छोड़ो, ये सात-फेरों की रस्में,
मेरी किस्मत पे एतबार नहीं,
ए मालिक,
तुझे देखने के बाद.
बहुत दूर से आया हूँ,
तुम्हे अपना बनाने को.
अब पर्दा बर्दास्त नहीं होता,
यूँ नजरे मिलाने के बाद.
परमीत सिंह धुरंधर
शाम होते ही उनकी तलब होती है,
मोहब्बत जिंदगी बदल देती है.
रहम की भीख क्यों और किस से मांगे,
मेरी आंसूओं पे ही वो मुस्करा देती है.
परमीत सिंह धुरंधर
अब मोहब्बत में क्या पाक रहा दोस्तों,
जब इसमें भी पैसो का हिसाब होता है.
परमीत सिंह धुरंधर