ए मौसम देख ज़रा
क्यों मेरा रंग है खिला – खिला?
ऐसी चढ़ी जवानी मुझपे
रखती हूँ मैं चोली का बटन खुला – खुला।
कितने भौरें तड़प रहें?
कितने भौरें हैं तरस रहें?
ए मौसम देख ज़रा
मेरे वक्षों पे है बसंत नया – नया.
परमीत सिंह धुरंधर
ए मौसम देख ज़रा
क्यों मेरा रंग है खिला – खिला?
ऐसी चढ़ी जवानी मुझपे
रखती हूँ मैं चोली का बटन खुला – खुला।
कितने भौरें तड़प रहें?
कितने भौरें हैं तरस रहें?
ए मौसम देख ज़रा
मेरे वक्षों पे है बसंत नया – नया.
परमीत सिंह धुरंधर
मेरा कौवा काला – काला
ढूंढे कोई मधुशाला
जहाँ मदिरा हाँ पिलाये
कोई कमसिन सी एक बाला।
दो नयना हो तीखे – तीखे
और वक्षों के मध्या
चमके कोई छोटा
सा तिल एक काला।
फिर पंख फैला के
उड़ जाए आसमा में
चोंच के मध्या दबा के
चोली का कोई धागा।
तुमने ऐसा प्यासा छोड़ा
नासूर बन गया फोड़ा
अब तो ये प्यास मिटती नहीं
चाहे जितना भी पिलाती मेडोना।
तेरी आँखों का जादू
लूट ले गया मेरा पूरा काबुल
पतली कमर तूने हिला के
ऐसे मारा दिल पे हथोड़ा।
सब कहते हैं मैं हूँ पागल
तूने ऐसे छनकाया अपना छागल
डोली चढ़ गयी किसी और के
मुझको खिला के गरम पकोड़ा।
सत्ता में हैं मोदी
यूपी को संभाले योगी
मुझको तूने ऐसे नचाया
जनता को नचाये जैसे
केजरी – ममता – और माया।
कौवा बोलै इश्क़ में
तुझे प्यार करूँगा लेके risk मैं.
काला हूँ पर हूँ बिहारी मैं
गोता लगाता हूँ बड़ा तीव्र मैं.
परमीत सिंह धुरंधर
राजा, आँखों में तेरे प्यास बहुत है
डरता है दिल, शर्म उतारूं कैसे?
तू लगता है शातिर, चालक बहुत है
घूँघट मैं अपना उठाऊं कैसे?
राजा, तू है एक निर्दयी, तुझमे अहंकार बहुत है
अपने वक्षों से आँचल सरकाऊ कैसे?
तेरे नजर है बस जिस्म पे, जिसे पाना आसान बहुत है
ऐसे हरजाई संग घर बसाऊं कैसे?
परमीत सिंह धुरंधर
This year is very special for those who know DS2019. After this year, the new generation will know DS2019 but can not live in 2019 with DS2019.
Parmit Singh Dhurandhar
सैया मेरा काला – काला, काला – काला सा
चौसठ की उम्र में ढूंढे सोलह की बाला।
ढल गयी मेरी जवानी, चुल्लेह पे बैठे – बैठे
वो खाट पे बैठे – बैठे ढूंढे रोज मुर्ग – मशाला।
परमीत सिंह धुरंधर
जिंदगी के गम को कुछ यूँ भुलाता हूँ
अपनी सफ़ेद दाढ़ी पे उन के हुश्न का रंग लगाता हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
तन्हाइयों में शहनाइयाँ बजने लगे
मोहब्बत ऐसे मुकाम पे आ गयी है.
मैं मोदी सा खामोश हो गया
और वो ममता सी गठबंधन में आ गयी है.
परमीत सिंह धुरंधर
अजनबियों की दौलत मैं उठाता नहीं
और अपनों से मैं कुछ चुराता नहीं।
मेरा खुदा भी कहता है की Crassa
इस सांचे से फिर ऐसा कोई ढलता नहीं।
माना की विफल बहुत है जीवन में
मगर मयखाने में मंदिर, मंदिर में मयखाना
यूँ तो कोई और करता नहीं।
ईसा में राम, राम में ईसा
ऐसे तो कोई टूटा आशिक़ देखता नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर