महाराणा प्रताप और हल्दीघाटी.


आज की रात,
जरा सज के मिल,
ना जाने,
कल हल्दीघाटी में,
क्या होगा.
दिल में तुम्ही,
रहोगी प्रिये,
मगर, न जाने,
कल, महाराणा का,
तन कहाँ होगा.
बिखरा दे अपनी जुल्फों को,
मेरे इस जख्मों से सने तन पे,
न जाने, खडग का वार
अब कहाँ होगा.
आ जरा, पास
तेरे सीने पे, सर
रख के सो लूँ,
जाने फिर कहाँ,
अब विश्राम होगा.
यूँ न कुम्हला मेरी क्षत्राणी ,
इस जिन्दगी की चाहत में,
जब तक महाराणा के हाथों में ,
खडग है, जोधा के हलक,
में भी अटका उसका प्राण होगा.
मैं उठा हूँ,
अपने मेवाड़ के लिए,
जो आबरू है मेरी,
वो बढ़ा है ,
अपने विस्तार के लिए,
जो आरजू है उसकी,
इन मधुर ओठों से पिला कर,
विदा कर मुझे,की
जाने इस बार , कैसा
भीषण स्नाग्राम होगा, परमित…….Crassa