मेरे श्रीराम प्रभु


मैं बुलंद हूँ, और बुलंदी मेरी आपके नाम से मेरे प्रभु
मैं भक्त हूँ, और मेरी भक्ति आपके चरणों से मेरे प्रभु।
स्वयं शिव भी लगावे ध्यान जिसका
रुद्रावतार लेकर करे बखान जिसका
टूट जाए माया की हर जंजीर, एक तेरे नाम पे प्रभु
भवसागर में सहारा बस एक तेरा ही, मेरे श्रीराम प्रभु।

Dedicate to the Shri Ram Mandir construction.

परमीत सिंह धुरंधर 

नारायण, भोलेनाथ और भगवान्


आम -कटहल
गेहूँ -धान
जामुन -लीची
इन नामों को किसान जीवन देता है.
ख़्वाबों को हकीकत
और जिव्हा को स्वाद देता है.

परमार्थ क्या, स्वार्थ क्या?
अरे राजा के यज्ञ
और ब्राह्मणों के हवन -कुंड में
देवताओं के आव्हान को
सफल करने को घी और अन्न देता है.

धरा को सुंदरता -सौम्यता
पक्षी – कीट, मूषक को
परिश्रम का मौक़ा
गाय – बैल को देवी -देवता
और पत्नी को गृहलक्ष्मी बनने
का सुनहरा अवसर देता है.

पुत्र को आलस
पुत्री को अच्छे वर का ख्वाब
चिलचिलाती धुप और कड़कड़ाती ठंढ में
उषा के आगमन पे
बिना विचलित हुए
किसान हाथों में अपने
हल थाम लेता है.

इंसान इसी रूप में
मुझे नारायण, भोलेनाथ
और भगवान् लगता है.

परमीत सिंह धुरंधर 

श्री गणेश और मूषक


पिता और मैं, जैसे
सुबह की लालिमा
और चाँद की शीतलता
दोनों एक साथ
जिसका स्वागत करते
पक्षीगण कलरव गान से.

पिता और मैं
सुसुप्त अवस्था में
जैसे कोई ज्वालामुखी
और बहुत अंदर उसके सीने में
कहीं आग सा धड़कता मैं.

पिता और मैं, जैसे
छपरा का कोई धुरंधर
त्यागकर अपनी चतुराई
और चतुरंगी सेना
बना मेरा सारथि
और कुरुक्षेत्र में उतरता
नायक बन कर मैं.

पिता और मैं, जैसे
शिव और भुजंग
पिता और मैं, जैसे
हरी और सुदर्शन
पिता और मैं, जैसे
सूर्य और अम्बर
पिता और मैं, जैसे
श्री गणेश और मूषक।

परमीत सिंह धुरंधर

प्रेम हो तो पिता सा – 2


प्रेम हो तो पिता सा
गोर मुख पे काले तिल सा.
हम सोंचे ये रूप है मेरा
ये यौवन है मेरा
मगर जमाना जानता है
की ये कमाल है इस तिल का.

हवाओं ने रुख बदले
सितारों ने चाल बदले
यौवन के ज्वार में रिश्ते
और रिश्तेदार बदले
मगर वो अटल है अम्बर पे ध्रुव सा.

परमीत सिंह धुरंधर

अंततः उन्हें कोई भाया था


खुले दिल से
अरमानों को सजाया था
कुछ टूट गए, कुछ सूख गए
मैंने दिल ही कुछ ऐसे लगाया था.

हम तन्हा रह गए
कोई शिकवा नहीं
अंततः उन्हें कोई भाया था
जिसके संग
उन्होंने परिणय-पत्र छपवाया था.

परमीत सिंह धुरंधर

परफेक्ट प्यार


उम्र भर जो भागी एक परफेक्ट प्यार को
अब लिख रहीं हैं की प्यार परफेक्ट नहीं होता।
इससे बड़ी प्यास क्या होगी जीवन में?
प्यार पाकर भी कोई प्यार नहीं पाता।

पिता की गोद छोड़कर जो भागी थी प्यार में
उसके चार -चार बच्चों की माँ बनके भी आनंद नहीं आता.
इससे बड़ी प्यास क्या होगी जीवन में?
प्यार पाकर भी कोई प्यार नहीं पाता।

जुल्फों में बांधकर जिसने कइयों को डुबाया है
अजब है उस कातिल को अब क़त्ल का मजा नहीं आता.
इससे बड़ी प्यास क्या होगी जीवन में?
प्यार पाकर भी कोई प्यार नहीं पाता।

ये शहर छपरा सभी का है सिर्फ मेरा ही नहीं
मगर हर किसी के नाम में छपरा नहीं होता।
इससे बड़ी प्यास क्या होगी जीवन में?
प्यार पाकर भी कोई प्यार नहीं पाता।

परमीत सिंह धुरंधर

फासला – 2


तुम्हे चाहत है जिस समंदर की
उसका किनारा कहीं पराया ना लगे.

हम तो जी लेंगें यूँ ही तड़प -तड़प के
गुलाबों की सेज कहीं तुझे रुलाया ना करे.

परमीत सिंह धुरंधर