एक शिकायत है


नजर है, नजाकत है
अदा में अदावत है.

कमर है, क़यामत है
खुदा की इनायात है.

ना रखा करो यूँ पर्दा
बस ये ही तो एक शिकायत है.

परमीत सिंह धुरंधर

ये शहर है दोस्तों


दौलत की चमक किसे नहीं भाती?
ये शहर है दोस्तों, यहाँ रोशनी नहीं आती.
रिश्तों की राहें तो बहुत हैं यहाँ
मगर कोई राह दिल तक नहीं जाती।

परमीत सिंह धुरंधर

ए शिव तुम कहाँ हो?


भीड़ में बहती जो वो नीर तो नहीं
तन्हाई में सूखती वो पीर तो नहीं।

टूटते तारें आसमाँ के
कहीं उनका निशाँ तो नहीं।

व्याकुल मन जिसे पल – पल पुकारे
वसुंधरा पे वो कहीं तो नहीं।

इससे बड़ी पराजय क्या होगी?
जब जीत की कोई लालसा ही नहीं।

उतार दो तुम ही ये खंजर मेरे सीने में
इन धड़कनों को तुम्हारी वेवफाई पे यूँ यकीं तो नहीं।

मुझे नहीं पता ए शिव तुम कहाँ हो?
मगर कोई और नाम सूझता भी तो नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

नादानी पे है


हर किसी की नजर जवानी पे है
बस हम ही हैं सनम जो नादानी पे है.

सब हैं यहाँ दिल जीतने को तेरा
बस हम ही हैं सनम जो दिल हारने पे है.

दौलत – शोहरत, क्या नहीं?
ये तेरे दामन को चाँद -तारों से सजा देंगे।
बस हम ही हैं सनम जो तेरे नखरे उठाने पे हैं.

ना पूछा कर हमसे,
क्या कर सकते हैं तेरे लिए?
जहाँ से सब तेरा साथ छोड़ दे,
वहाँ से हम निभाने पे हैं.

परमीत सिंह धुरंधर


रूप और धुप दोनों पल – दो – पल के मेहमान हैं
ढलते हैं, तो बचता कोई नहीं इनका निशाँ हैं.

वृक्ष अगर साथ हो तो फिर धुप भी मीठी छावं हैं
वफ़ा में घुला रूप तो अमृत सामान है.

परमीत सिंह धुरंधर

किस्मतें -द्वन्द


शहर को क्या पता है किस्मतें -द्वन्द का?
मेरे दिल से पूछों जिसे नशा है तुम्हारे अंग – अंग का.

उलझनों में बांध के क्या मोहब्बत करोगे?
ख्वाइस तुम्हे दौलत की और मुझे तुम्हारे वक्षों का.

राहें बदल – बदल कर कौन सी मंजिल पा लोगे?
स्थिर होने पे बुद्ध के, द्वार खुला था ज्ञान का.

परमीत सिंह धुरंधर